बंगाल। पश्चिम बंगाल की राजनीति भारत की सबसे दिलचस्प और बदलावों से भरी राजनीति मानी जाती है। यहां सत्ता का केंद्र समय-समय पर अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियों के हाथ में रहा है। कभी Indian National Congress का दबदबा रहा, तो कभी Communist Party of India (Marxist) के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा दशकों तक सत्ता में।
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स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दौर में बंगाल की राजनीति पर कांग्रेस का राज था। 1952 से लेकर 1972 तक लगभग सभी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ही प्रमुख शक्ति रही और उसने लगातार सरकार बनाई। इस दौरान राज्य के विकास और प्रशासनिक ढांचे को स्थापित करने में कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। हालांकि 1960 के दशक के अंत तक राजनीतिक अस्थिरता और गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हो गया, जिसने आगे आने वाले बड़े बदलाव की नींव रखी।

वहीं 1977 में बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ आया, जब CPI(M) के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में आया। यह सरकार लगातार 34 साल (1977-2011) तक चली, जो दुनिया की सबसे लंबी लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट सरकारों में से एक मानी जाती है। इस दौरान भूमि सुधार, पंचायत व्यवस्था और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर काम किया गया, जिससे वामपंथी राजनीति की मजबूत पकड़ बनी रही।
2011 में एक बड़ा बदलाव हुआ, जब ममता बनर्जी के नेतृत्व में TMC ने वाम मोर्चा सत्ता से हटा दिया। Mamata Banerjee की पार्टी ने 2011, 2016 और 2021 के चुनावों में लगातार जीत हासिल की और बंगाल की राजनीति में नया अध्याय लिखा। हालांकि हालिया West Bengal Assembly Election 2026 ने फिर से बंगाल की राजनीति को बदलने के संकेत दिए हैं। शुरुआती रुझानों और परिणामों में BJP ने मजबूत प्रदर्शन किया और कई सीटों पर बढ़त बनाई, जिससे राज्य में सत्ता परिवर्तन की संभावना बनी।
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