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Sunday, May 17, 2026

क्या कोई भी शख्स लॉ डिग्री लेकर लड़ सकता है खुद का केस? जानें यहां

डेस्क। ममता बनर्जी केवल एक राजनेता नहीं हैं, बल्कि उनके पास कानून की औपचारिक डिग्री भी है। अपने चुनावी हलफनामे में उन्होंने साफ किया था कि कोलकाता के जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई पूरी की है। इसके अलावा उनके पास इतिहास में बीए, बीएड और इस्लामिक इतिहास में एमए की डिग्रियां भी हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार, किसी भी याचिका को फाइल करने के लिए एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AOR) की जरूरत होती है लेकिन कानून किसी भी व्यक्ति को पार्टी-इन-पर्सन (अपनी बात खुद रखने वाला पक्ष) बनने की इजाजत देता है। ममता बनर्जी ने भी इसी प्रावधान का उपयोग कर शीर्ष अदालत से अनुमति ली थी और अपनी बात रखी थी। हालांकि, वहां भी Law की डिग्री से ज्यादा अदालत की अनुमति मायने रखती है।

एडवोकेट्स एक्ट 1961 की धारा 32 के तहत, अदालत के पास यह शक्ति है कि वह किसी भी ऐसे व्यक्ति को अपने सामने पेश होने और तर्क देने की अनुमति दे सके जो वकील के रूप में पंजीकृत नहीं है। भारत का कानून स्पष्ट करता है कि अपना केस लड़ने के लिए किसी विशेष कानूनी डिग्री या काले कोट की अनिवार्यता नहीं है। कोई भी आम आदमी जज की इजाजत लेकर अपनी पैरवी खुद कर सकता है लेकिन यहां काला कोट पहनना केवल बार काउंसिल के पंजीकृत वकीलों का विशेषाधिकार माना जाता है।

यदि आप अपना केस खुद लड़ना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको संबंधित जज से अनुमति लेनी होती है। अक्सर अदालतें कानूनी जटिलताओं को देखते हुए वकील रखने की सलाह देती हैं, लेकिन यदि आप अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने का भरोसा दिलाते हैं, तो जज इसकी अनुमति दे सकते हैं।

इस दौरान आप कागजी कार्यवाही और साक्ष्य जुटाने के लिए उचित समय की मांग भी कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए आपको अदालत की प्रक्रियाओं और कानूनी नियमों की बुनियादी समझ होना आवश्यक है, वरना प्रक्रियात्मक गलतियां केस पर भारी पड़ सकती हैं। ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ के माध्यम से आप अपने व्यक्तिगत मामले में अदालत के सामने खड़े हो सकते हैं, लेकिन आप किसी दूसरे व्यक्ति के केस की पैरवी नहीं कर सकते हैं।

Tag: #nextindiatimes #Law #MamataBanerjee

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