डेस्क। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे चरण का रण अब अपने चरम पर है। पहले चरण में हुए ऐतिहासिक 93.19 प्रतिशत मतदान ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल की जनता इस बार सत्ता की चाबी किसे सौंपनी है, इसे लेकर कितनी उत्साहित है। लेकिन असली सवाल मतदान के बाद का है। जब 41,001 मतदान केंद्रों से वोटिंग मशीनें निकलती हैं, तो उन्हें स्ट्रांग रूम के सुरक्षित घेरे में कैद कर दिया जाता है।
यह भी पढ़ें-SIR के बाद किस राज्य में कितने वोटर्स के कटे नाम, ऐसे करें सब कुछ चेक
जैसे ही मतदान का समय समाप्त होता है, पोलिंग बूथ पर गहमागहमी बढ़ जाती है। वहां तैनात प्रीसाइडिंग ऑफिसर सबसे पहले ईवीएम में दर्ज कुल वोटों के रिकॉर्ड का बारीकी से परीक्षण करता है। यह प्रक्रिया पारदर्शी रखी जाती है, ताकि किसी भी धांधली की गुंजाइश न रहे। वहां मौजूद सभी राजनीतिक दलों के पोलिंग एजेंटों को एक सत्यापित कॉपी सौंपी जाती है।

इसके बाद EVM को पूरी सावधानी के साथ सील किया जाता है। यहां से मशीनों का सफर स्ट्रांग रूम की ओर शुरू होता है, जहां लोकतंत्र की किस्मत को अगले कई दिनों के लिए सुरक्षित रख दिया जाता है। स्ट्रांग रूम की चाबी किसी एक व्यक्ति की सनक या मर्जी पर नहीं होती है। सुरक्षा मानकों के अनुसार एक जिले की सभी ईवीएम मशीनों की कमान डिस्ट्रिक्ट इलेक्टोरल ऑफिसर (DEO) के हाथों में होती है।
स्ट्रांग रूम में डबल लॉक सिस्टम यानी दोहरा ताला लगाया जाता है। इसकी चाबी जिला निर्वाचन अधिकारी और संबंधित रिटर्निंग ऑफिसर की निगरानी में सुरक्षित रखी जाती है। नियम यह भी है कि जब तक मतगणना का दिन नहीं आता, इस ताले को बिना चुनाव आयोग की अनुमति और उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बिना नहीं खोला जा सकता है।
Tag: #nextindiatimes #WestBengalElection #EVM




