डेस्क। Indian Currency का इतिहास हजारों साल पुराना है। यह सिर्फ पैसों का बदलाव नहीं बल्कि हमारे समाज, व्यापार और सोच के विकास की कहानी है। कभी लोग समुद्र से मिलने वाली छोटी-सी कौड़ी से सामान खरीदते थे और आज हम डिजिटल पेमेंट कर रहे हैं। आइए जानते हैं कि कौड़ी दमड़ी से लेकर ढेला और फिर रुपये तक का सफर क्या है?
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बहुत पुराने समय में भारत में सिक्के नहीं होते थे। उस समय लोग कौड़ी को ही पैसा मानते थे। ये छोटी-छोटी सीपियां समुद्र से मिलती थीं। इन्हें गिनकर सामान खरीदा जाता था। जैसे-जैसे व्यापार बढ़ा, लोगों को मजबूत और टिकाऊ मुद्रा की जरूरत पड़ी, तब धातु के सिक्के आए। जिसमें दमड़ी तांबे का छोटा सिक्का होता था और ढेला दमड़ी से भी छोटा होता था।इनका इस्तेमाल रोजमर्रा की छोटी खरीदारी में होता था।

दिल्ली सल्तनत के समय सिक्कों पर शासकों के नाम और अरबी लिखावट आने लगी। इससे मुद्रा पर भरोसा बढ़ा। मुगल काल में बदलाव हुआ। अकबर ने मुद्रा व्यवस्था को और बेहतर बनाया; जिसमें चांदी का रुपया, तांबे का दाम और सोने का मुहर शामिल हुए। यहीं से रुपया मजबूत रूप में सामने आया।
भारतीय रुपये की असली नींव शेरशाह सूरी के शासनकाल में पड़ी, जब उन्होंने पहली बार एक तय वजन और शुद्धता वाला चांदी का रुपया चलाया। मुगल काल में भी रुपया, आना और दमड़ी प्रचलन में रहे, जिससे यह व्यवस्था और मजबूत हुई फिर ब्रिटिश काल में 1861 में कागजी नोटों की शुरुआत हुई और मुद्रा प्रणाली को नया रूप मिला। 1957 में दशमलव प्रणाली लागू होने पर 1 रुपया 100 पैसा तय किया गया, जिससे पुरानी इकाइयां खत्म हो गईं। वहीं नए नोटों पर गांधी जी और राष्ट्रीय प्रतीक आने लगे।
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