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Monday, April 20, 2026

कैसे तय होता है संसद में बोलने का समय, जानें क्या होता है अलॉटमेंट प्रोसेस?

नई दिल्ली। पिछले दिनों Parliament के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल पर छिड़ी जोरदार बहस के बीच सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच शब्दों के बाण चले। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब सदन में सैंकड़ों सांसद मौजूद हों तो यह कैसे तय होता है कि किसे कितनी देर बोलना है?

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लोकसभा में बोलने का समय निर्धारित करने की जिम्मेदारी ‘बिजनेस एडवाइजरी कमेटी’ की होती है। यह एक शक्तिशाली समिति है जिसमें कुल 26 सांसद शामिल होते हैं।इनमें 15 सदस्य लोकसभा से और 11 सदस्य राज्यसभा से लिए जाते हैं। लोकसभा में इस कमेटी के मुखिया खुद स्पीकर होते हैं, जबकि राज्यसभा में सभापति इसकी अध्यक्षता करते हैं।

इस कमेटी की सबसे खास बात यह है कि इसमें कोई भी मंत्री सदस्य नहीं बन सकता है। यह कमेटी ही तय करती है कि किस बिल पर कितनी देर चर्चा होगी और सरकार को कौन सा मुद्दा कब सदन में लाना चाहिए। सदन की कार्यवाही में किस पार्टी का कितना दबदबा होगा, यह गणित सांसदों की संख्या पर टिका होता है।a जिस पार्टी के पास जितने अधिक सांसद होंगे, उसे बहस के दौरान उतना ही ज्यादा समय दिया जाएगा।

बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की सलाह पर लोकसभा स्पीकर सभी पार्टियों की सदस्य संख्या के अनुपात में समय का बंटवारा कर देते हैं। यही वजह है कि बड़ी पार्टियों के नेता घंटों तक भाषण देते हैं, जबकि छोटे दलों के सांसदों को अपनी बात रखने के लिए महज कुछ मिनट ही मिलते हैं। जब किसी बिल पर चर्चा शुरू होनी होती है, तो हर पार्टी अपने संभावित वक्ताओं की एक सूची तैयार करती है। पार्टी नेतृत्व ही तय करता है कि उसकी तरफ से कौन पहले बोलेगा और कौन बाद में।

Tag: #nextindiatimes #Parliament #Loksabha

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