डेस्क। हाल ही में लोकसभा में महिला आरक्षण बिल से जुड़ा अहम संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो सका। इसी बीच लोगों का ध्यान भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था पर गया। दरअसल यहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व एकदम शून्य है।
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अफगानिस्तान एकमात्र ऐसा देश बनकर उभरा है जहां पर महिलाओं को शासन प्रशासन (Administration) से पूरी तरह से बाहर कर दिया गया है। 2021 में तालिबान के सत्ता पर काबिज होने के बाद से अफगानिस्तान के मंत्रिमंडल या फिर सरकार के किसी भी स्तर पर एक भी महिला शामिल नहीं है।मौजूदा वास्तविक प्रशासन पूरी तरह से महिलाओं की भागीदारी के बिना चल रहा है।

2021 से पहले अफगानिस्तान ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के क्षेत्र में काफी प्रगति की थी। 2004 के संविधान के तहत संसद की 25% सीट महिलाओं के लिए आरक्षित थीं। हालांकि आज संसद में कोई महिला सदस्य नहीं है और पूरी संसदीय व्यवस्था को प्रभावी रूप से खत्म कर दिया गया है। तालिबान ने पिछली संवैधानिक व्यवस्था को निलंबित कर दिया है, जिसने महिलाओं को समान अधिकार दिए थे।
इसी के साथ महिलाओं ने ना सिर्फ अपना राजनीतिक प्रतिनिधित्व खो दिया है बल्कि वे कानूनी सुरक्षाएं भी खो दी हैं जो कभी शासन और समाज में उनकी भागीदारी को मजबूत करती थी। 2024-25 में लागू किए गए नए कानूनों ने प्रतिबंधों को और भी ज्यादा सख्त कर दिया है। अब महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर अपने चेहरे और शरीर को पूरी तरह से ढकना अनिवार्य है। इसी के साथ वे किसी भी पुरुष अभिभावक के बिना लंबी दूरी की यात्रा नहीं कर सकतीं। इतना ही नहीं उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर ऊंची आवाज में बोलने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है।
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