नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल सामने आ चुके हैं। इसी बीच लोगों के मन में एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर एग्जिट पोल के अनुमान कैसे लगाए जाते हैं और इसकी प्रक्रिया कितनी महंगी होती है?
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Exit Polls वोटिंग के दिन, ठीक पोलिंग स्टेशनों के बाहर किए जाते हैं। जैसे ही वोटर अपना वोट डालकर बाहर निकलता है एक सर्वेक्षक उनके पास जाकर कुछ सवाल जवाब करता है। इन सवालों में कुछ बुनियादी जानकारी इकट्ठा की जाती हैं ताकि यह पता लग सके कि आखिर वोटर ने किसे वोट दिया है। हालांकि ये नतीजे तुरंत जारी नहीं किए जाते।
भारत के चुनाव आयोग द्वारा तय नियमों के मुताबिक एग्जिट पोल के नतीजे तभी दिखाए जा सकते हैं जब वोटिंग के सभी चरण पूरे हो जाएं। ऐसा इसलिए ताकि चल रहे चुनावों में वोटरों पर इसका कोई असर न पड़े। कई बार अगल-अलग विधानसभाओं या लोकसभाओं में कुछ बूथों पर मतदाताओं से बातचीत के आधार डेटा तैयार किया जाता है। जिसे मतदान खत्म होने के बाद प्रस्तुत किया जाता है।

एग्जिट पोल करवाना कोई सस्ता काम नहीं है। इसके लिए सैकड़ों जगहों पर हजारों प्रशिक्षित फील्ड वर्करों को तैनात करना पड़ता है। इन वर्करों को प्रशिक्षण, आने-जाने की व्यवस्था, रहने की जगह और रोजाना का भत्ता देना पड़ता है। इन सब चीजों का खर्च काफी तेजी से बढ़ता है। खर्च बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है सैंपल का आकार। 50000 से 70000 वोटरों को शामिल करने वाले सर्वे में कुछ करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं लेकिन जब सैंपल का आकार बढ़कर कई लाख तक पहुंच जाता है तो बजट भी तेजी से बढ़ जाता है।
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