डेस्क। मिडिल ईस्ट में जारी जंग ने दुनिया भर में ऊर्जा संकट पैदा कर दिया है, जिससे भारत में भी एलपीजी गैस की आपूर्ति पर असर पड़ा है। ऐसे में केरोसिन (Kerosene Oil) एक बार फिर भारतीय रसोइयों में दस्तक दे रहा है। इसे हम बचपन से मिट्टी का तेल कहते आए हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसका यह नाम क्यों पड़ा?
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केरोसिन असल में एक पेट्रोलियम प्रोडक्ट है। यह उसी कच्चे तेल से रिफाइन करके निकाला जाता है, जिससे पेट्रोल और डीजल बनते हैं। इसे मिट्टी का तेल इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका स्रोत जमीन की गहराइयों में छिपा होता है। मिट्टी के नीचे से निकलने के कारण ही इसका नाम मिट्टी का तेल पड़ गया।
कच्चा तेल जमीन के अंदर हजारों फीट नीचे मौजूद होता है। जब इस कच्चे तेल को बाहर निकालकर रिफाइनरी में साफ़ किया जाता है तो अलग-अलग तापमान पर पेट्रोल, डीजल और केरोसिन जैसी चीजें अलग होती हैं।इसे फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन कहा जाता है। केरोसिन का निर्माण इस प्रक्रिया के एक खास चरण में होता है। चूंकि यह पूरी तरह से जमीन के अंदर मौजूद जीवाश्म ईंधन से जुड़ा है, इसलिए भारत के ग्रामीण और शहरी इलाकों में इसे जमीन या मिट्टी से जोड़ने वाला नाम दे दिया गया।

भारत के कई हिस्सों, खासकर महाराष्ट्र और उत्तर भारत के कुछ इलाकों में केरोसिन को घासलेट भी कहा जाता है। यह नाम सुनने में जितना देसी लगता है, इसकी जड़ें उतनी ही विदेशी हैं। पुराने समय में जब विदेशों से गैस से चलने वाली लाइटें भारत आईं, तो ग्रामीण भारतीयों के लिए गैस लाइट शब्द बोलना थोड़ा कठिन था। धीरे-धीरे लोगों ने अपनी सुविधा के अनुसार इसे घासलेट कहना शुरू कर दिया।
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