डेस्क। क्या आप जानते हैं कि जब कोई इंसान झूठ बोलता है, तो उसका शरीर उसे धोखा दे सकता है? दरअसल 18 जनवरी 1951 का दिन इतिहास में बेहद खास है क्योंकि इसी दिन नीदरलैंड्स में पहली बार ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ का इस्तेमाल किया गया था। यह एक ऐसी तकनीक है जो इंसान की धड़कनों और सांसों को मापकर सच और झूठ का पता लगाने की कोशिश करती है।
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भले ही इसका पहला बड़ा इस्तेमाल 1951 में हुआ लेकिन इस तकनीक का आविष्कार उससे करीब 30 साल पहले ही हो चुका था। साल 1921 में जॉन ऑगस्टस लार्सन ने इसे बनाया था। लार्सन की खासियत यह थी कि वह एक वैज्ञानिक होने के साथ-साथ एक पुलिस अधिकारी भी थे। उन्होंने एक ऐसा उपकरण तैयार किया जो सवालों के जवाब देते समय इंसान के शरीर में होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड कर सके।

Lie detector को ‘पॉलीग्राफ’ (Polygraph) भी कहा जाता है। यह मशीन सीधे तौर पर यह नहीं बताती कि कोई सच बोल रहा है या झूठ। यह मशीन तो बस आपके शरीर के संकेतों को मापती है। जब किसी व्यक्ति का टेस्ट होता है, तो मशीन उसकी दिल की धड़कन, ब्लड प्रेशर, सांस लेने की गति और त्वचा की नमी को रिकॉर्ड करती है।
जांच के समय व्यक्ति को मशीन से जोड़ा जाता है और उससे सवाल पूछे जाते हैं। मशीन शरीर की प्रतिक्रियाओं को एक ग्राफ के रूप में दर्ज करती रहती है। शुरुआत में सामान्य सवाल पूछे जाते हैं और फिर धीरे-धीरे जांच से जुड़े सवाल आते हैं। अगर किसी खास सवाल पर शरीर की प्रतिक्रिया या ग्राफ में अचानक बदलाव दिखता है, तो विशेषज्ञों को उस व्यक्ति पर संदेह हो जाता है।
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