अमेरिका। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने सदी का सबसे बड़ा टैरिफ वॉर (tariff war) छेड़ दिया है। इससे दुनिया के सभी देशों की अर्थव्यवस्था हिल गई है। ट्रंप ने अमेरिका (America) में एक्सपोर्ट करने वाले कम से कम 60 देशों पर 10% से ज्यादा टैक्स लगाया है। भारत के अमेरिका में एक्सपोर्ट पर 26% टैरिफ लगाया है। माना जा रहा है कि इसी के साथ दुनिया टैरिफ वॉर (tariff war) के दौर में प्रवेश कर गई है।
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आइये जानते हैं कि टैरिफ (tariff war) क्या है और यह कैसे काम करता है? आयात पर लगने वाला टैक्स है टैरिफ टैरिफ आयात पर लगने वाला टैक्स है। आम तौर पर खरीदार जिस कीमत पर विदेशी विक्रेता से सामान खरीदता है; उस कीमत का एक तय प्रतिशत टैरिफ वसूला जाता है। अमेरिका में कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन एजेंट्स पूरे देश में 328 बंदरगाहों पर टैरिफ एकत्र करते हैं। अमेरिका में टैरिफ दरें अमेरिका में उत्पादों के हिसाब से टैरिफ दरें अलग-अलग हैं।
उदाहरण के लिए पैसेंजर कारों पर यह 2.5 प्रतिशत और गोल्फ शूज पर 6 प्रतिशत हैं। उन देशों के लिए टैरिफ दरें कम हो सकती हैं, जिनके साथ अमेरिका का व्यापार समझौता है। कनाडा और मेक्सिको पर 25 प्रतिशत टैक्स लगाए जाने से पहले अमेरिका और इन देशों के बीच ज्यादातर उत्पादों का व्यापार टैरिफ से मुक्त था। इसकी वजह अमेरिका का मेक्सिको और कनाडा के साथ व्यापार समझौता था। अर्थशास्त्री टैरिफ को सही कदम नहीं मानते हैं।

अमेरिका के लिहाज से बात करें तो वास्तव में आयात कर यानी अमेरिका की कंपनियां टैरिफ (tariff war) का भुगतान करती हैं। यह कंपनियां सामान्य तौर पर इस बढ़ी हुई लागत का बोझ कीमतें बढ़ा कर ग्राहकों पर डालती हैं। इसीलिए अर्थशास्त्री कहते हैं टैरिफ का बिल आखिरकार उपभोक्ता चुकाते हैं। देश को होता है नुकसान जिस देश के उत्पादों पर टैरिफ लगता है, उसके उत्पाद महंगे हो जाते हैं और उनको विदेश में बेचना मुश्किल हो जाता है, ऐसे में उस देश को व्यापार मोर्चे पर नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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