नई दिल्ली। भारत के न्यायिक इतिहास में आज का दिन एक भावुक और कानूनी मोड़ लेकर आया है। सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से बिस्तर पर पड़े 31 वर्षीय हरीश राणा के परिवार को उनके लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट को वापस लेने की अनुमति दे दी है। भारत में इसके कड़े नियम हैं, वहीं दुनिया में स्विट्जरलैंड जैसे देश भी हैं, जहां मौत का चुनाव करना कहीं ज्यादा आसान है।
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भारत में जिस तरीके को मंजूरी मिली है उसे Passive Euthanasia कहा जाता है। इसमें मरीज को कोई जहरीला इंजेक्शन या दवा देकर सीधे तौर पर नहीं मारा जाता है।इसके बजाय मरीज को जिंदा रखने वाले जो कृत्रिम साधन हैं- जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या लाइफ सपोर्ट सिस्टम, उन्हें हटा लिया जाता है।
इच्छामृत्यु या सहायता प्राप्त आत्महत्या के मामले में स्विट्जरलैंड को दुनिया का सबसे उदार देश माना जाता है। स्विट्जरलैंड की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां व्यक्ति का लाइलाज बीमारी से ग्रस्त होना अनिवार्य नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अपनी शारीरिक अक्षमता या जीवन से अत्यधिक थकान के कारण मरना चाहता है, तो उसे अनुमति मिल सकती है।

स्विट्जरलैंड में ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ (डॉक्टर द्वारा जहर देना) तो अवैध है, लेकिन ‘असिस्टेड सुसाइड’ कानूनी है. यहां का नियम है कि आखिरी कदम मरीज को खुद उठाना होगा।संस्थाएं घातक दवा (जैसे सोडियम पेंटोबार्बिटल) उपलब्ध कराती हैं, लेकिन उसे पीना या नली का वाल्व खोलना मरीज का अपना काम होता है। नीदरलैंड और बेल्जियम वे पहले देश थे, जिन्होंने ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ को कानूनी बनाया। यहां डॉक्टर खुद मरीज को घातक दवा का इंजेक्शन दे सकते हैं। यहां मरीज को ‘असहनीय पीड़ा’ में होना चाहिए और मेडिकल बोर्ड को यह यकीन दिलाना होता है कि सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है।
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