लाइफस्टाइल डेस्क। जब शरीर में कोई इंफेक्शन या सूजन होती है, तो शरीर खुद उसे पहचानने और लड़ने की कोशिश करता है। इसी प्रक्रिया में लीवर एक स्पेशल प्रोटीन बनाता है जिसे सी-रिएक्टिव प्रोटीन या सीआरपी कहा जाता है। इस प्रोटीन का स्तर जब बढ़ता है, तो यह संकेत देता है कि शरीर में कहीं न कहीं सूजन या इंफेक्शन मौजूद है। यही कारण है कि डॉक्टर अक्सर मरीजों को CRP Test कराने की सलाह देते हैं।
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सीआरपी टेस्ट एक सामान्य ब्लड टेस्ट है लेकिन इसके नतीजे कई गंभीर बीमारियों की ओर इशारा कर सकते हैं। सीआरपी टेस्ट खून में मौजूद इस प्रोटीन की मात्रा मापता है। इसके अलावा ऑटोइम्यून बीमारियां जैसे कि रूमेटॉइड आर्थराइटिस और ल्यूपस में शरीर अपनी ही सेल्स पर हमला करता है। इन स्थितियों में भी सीआरपी का स्तर बढ़ा हुआ मिलता है, जिससे बीमारी की सक्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

आंतों की सूजन संबंधी बीमारियों में भी सीआरपी बढ़ सकता है। कुछ ऐसे टेस्ट होते हैं, जिसे एचएस-सीआरपी कहते हैं, वह हार्ट की सेहत का आकलन करने में काम आता है। अगर इसका स्तर लगातार बढ़ा हुआ हो, तो यह हार्ट की ब्लड वेसेल्स में सूजन और भविष्य में हार्ट अटैक के जोखिम का संकेत हो सकता है।
सामान्य रूप से हर व्यक्ति को यह टेस्ट कराने की जरूरत नहीं होती लेकिन अगर बार-बार इंफेक्शन, लगातार बुखार, जोड़ों में दर्द, थकान या किसी गंभीर बीमारी के लक्षण दिख रहे हों तो डॉक्टर इसे सुझा सकते हैं। हृदय रोग के बढ़ते मामलों को देखते हुए 30 से 40 साल की उम्र के बाद एचएस-सीआरपी टेस्ट समय-समय पर कराना फायदेमंद हो सकता है, खासकर यदि परिवार में हार्ट रोग की कोई हिस्ट्री हो।
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