लाइफस्टाइल डेस्क। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सूरज की रोशनी से दूर होते जा रहे हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक खास तरह की रोशनी हमारे शरीर के लिए किसी वरदान से कम नहीं है? कभी फ्रींज मानी जाने वाली Red Light Therapy आज चिकित्सा जगत में तहलका मचा रही है।
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इस थेरेपी की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे एक सच्ची और भावुक कर देने वाली कहानी है। साल 2021 में मशहूर डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. डेविड ओजोग के 18 वर्षीय बेटे को स्ट्रोक आया।उस वक्त हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक सहकर्मी ने उन्हें बेटे के सिर पर ‘रेड और नियर-इंफ्रारेड लाइट’ इस्तेमाल करने की सलाह दी। शुरुआत में डॉ. ओजोग को यह मजाक लगा, लेकिन इसके नतीजों ने सबको हैरान कर दिया। आज उनका बेटा न केवल चलने-फिरने में सक्षम है, बल्कि अपनी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पर भी लौट आया है।

वैज्ञानिक भाषा में इसे फोटोबायोमॉड्यूलेशन कहा जाता है। इसमें 600 से 1100 नैनोमीटर की वेवलेंथ वाली लाल और नियर-इंफ्रारेड रोशनी का इस्तेमाल होता है, जो असल में सूरज की रोशनी का ही एक हिस्सा है। इसे एलईडी पैनल, खास मास्क या लेजर डिवाइस के जरिए शरीर पर डाला जाता है। रेड एलईडी लाइट से इंसानों के घाव भी तेजी से भर रहे हैं।
यह बालों के झड़ने को रोकने और रेडिएशन के कारण होने वाली त्वचा की सूजन को कम करने में असरदार है। नसों का दर्द और पैरों के अल्सर को ठीक करने में यह काफी मददगार साबित हुई है। डिप्रेशन और उम्र के साथ कमजोर होती आंखों की रोशनी में भी इसके पॉजिटिव रिजल्ट मिले हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह थेरेपी पार्किंसंस रोग में डोपामाइन बनाने वाले न्यूरॉन्स को बचाने में भी कारगर हो सकती है।
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