डेस्क। तुर्कमेनिस्तान के विशाल काराकुम रेगिस्तान के बीचों-बीच एक ऐसा गड्ढा मौजूद है, जिसे देखकर लगता है कि मानो साक्षात नरक का द्वार खुल गया हो। दरवाजा गैस क्रेटर के नाम से मशहूर यह जगह पिछले 53 सालों से लगातार धधक रही है। आग (Fire) की ऊंची लपटें और भीषण गर्मी इस गड्ढे को दुनिया की सबसे अनोखी और डरावनी जगहों में से एक बनाती हैं।
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वैज्ञानिकों से लेकर पर्यटकों तक हर कोई इस गेटवे टू हेल की हकीकत जानकर दंग रह जाता है। इस आग की शुरुआत साल 1971 में हुई थी, जब तुर्कमेनिस्तान सोवियत संघ का हिस्सा था। उस दौरान सोवियत वैज्ञानिक तेल और गैस की खोज में रेगिस्तान की खुदाई कर रहे थे।अचानक उनकी ड्रिलिंग मशीन एक विशाल गैस भंडार में जा घुसी, जिससे वहां की जमीन धंस गई और एक बड़ा गड्ढा बन गया।

वैज्ञानिकों ने देखा कि इस गड्ढे से भारी मात्रा में जहरीली मीथेन गैस निकल रही है। उस समय उन्हें लगा कि अगर गैस यूं ही निकलती रही, तो पर्यावरण और आसपास के इलाकों को बड़ा नुकसान होगा। मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है और उस वक्त के वैज्ञानिकों ने सोचा कि सबसे अच्छा तरीका इसे जला देना है।
उन्होंने अनुमान लगाया था कि गड्ढे में आग लगाने के कुछ हफ्तों बाद जब सारी मीथेन गैस जलकर खत्म हो जाएगी, तो आग अपने आप बुझ जाएगी, लेकिन वैज्ञानिकों का यह अंदाजा पूरी तरह गलत साबित हुआ। काराकुम रेगिस्तान के नीचे मौजूद गैस का भंडार इतना विशाल था कि आग आज भी उसी तीव्रता से जल रही है। गैस की निरंतर आपूर्ति ने इस गड्ढे को एक कभी न खत्म होने वाली भट्ठी में तब्दील कर दिया है।
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