डेस्क। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया अभी पूरे भारत के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही है। इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया की इस कोशिश का मकसद यह पक्का करना है कि वोटर रोल सही, ट्रांसपेरेंट और गलतियों से मुक्त हो। इसी बीच आइए जानते हैं कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन और स्पेशल रिवीजन के बीच क्या अंतर है?
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स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) एक पूरी शुरू से शुरू होने वाली प्रक्रिया है। पुरानी वोटर लिस्ट पर निर्भर रहने के बजाय इलेक्शन कमीशन असल में नए डाटा कलेक्शन के जरिए वोटर रोल को फिर से बनाता है। इस तरीके के तहत बूथ लेवल ऑफिसर घर-घर जाकर सर्वे करते हैं और साथ ही हर घर के लिए नई गिनती के फॉर्म भरते हैं।

स्पेशल रिवीजन पूरी तरह से रिकंस्ट्रक्शन के बजाय एक अपडेटेड और करेक्शन प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में एडमिनिस्ट्रेशन मौजूदा इलेक्टोरल डेटाबेस पर निर्भर करता है। बूथ लेवल ऑफिसर अपने बूथ एरिया में पहले से रजिस्टर्ड वोटर्स के नाम वाले पहले से भरे हुए वोटर रजिस्टर के साथ काम करते हैं। सभी की दोबारा गिनती करने के बजाय वे डिटेल्स वेरीफाई करते हैं और सिर्फ वहीं बदलाव करते हैं जहां पर गड़बड़ियां पाई जाती हैं।
इन दोनों प्रक्रिया में वोटर लिस्ट की इंटीग्रिटी बनाए रखने के लिए कुछ वेरिफिकेशन चेक जरूरी हैं। पहला कदम यह कंफर्म करना है की वोटर असल में रजिस्टर्ड पते पर रहता है या फिर नहीं। अगर कोई व्यक्ति हमेशा के लिए शिफ्ट हो गया है तो उसका नाम हटाने या ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू की जाती है। मरे हुए लोगों के नाम पहचानकर हटाए जाते हैं। इसी के साथ नाम में स्पेलिंग की गलतियां या तस्वीरों का मेल ना खाना ठीक किया जाता है।
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