वाराणसी। वाराणसी के Manikarnika Ghat पर चल रहे सौंदर्यीकरण और पुनर्विकास कार्य को लेकर बहुत से लोग नाराज हैं। लोगों का मानना है कि काशी के पंचतीर्थों में सबसे श्रेष्ठ माने जाने वाले मणिकर्णिका घाट पर तोड़फोड़ उनकी आस्था को चोट पहुंचाने वाली है। इन सबसे इतर मणिकर्णिका घाट सदियों से मोक्ष, आस्था, विश्वास और जीवन-मृत्यु चक्र का प्रतीक बना हुआ है।
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पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु ने यहां एक पवित्र कुंड का निर्माण किया था। भगवान विष्णु ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यहीं कठोर तपस्या की थी। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने यहीं वास करने का वरदान दिया। इसी कारण यह क्षेत्र शैव और वैष्णव परंपराओं के संगम का प्रतीक माना जाता है। घाट पर स्थित विष्णु चरण पादुका मंदिर इस धार्मिक समन्वय का प्रमाण है।

मणिकर्णिका घाट का अस्तित्व गुप्त काल से भी पहले माना जाता है। हालांकि घाट की पत्थर की सीढ़ियों का निर्माण 1303 ईस्वी के आसपास हुआ था। यह स्पष्ट नहीं है कि इसे किस शासक ने बनवाया, लेकिन यह तय है कि यह घाट सदियों से लगातार विकसित होता रहा है। मुगल काल में भी स्थानीय हिंदू राजा और जमींदार गुप्त रूप से इसके रखरखाव में सहयोग करते रहे।
आप जब भी मणिकर्णिका घाट पर चले जाएं, वहां चिताएं जलती ही नजर आएंगी। लोगों को विश्वास हो गया है कि मणिकर्णिका घाट पर चिता की आग कभी नहीं बुझती। पौराणिक मान्यता है कि देवी पार्वती के श्राप के कारण ऐसा होता है।दरअसल पौराणिक कथा है कि मणिकर्णिका घाट पर देवी पार्वती के कानों का कुंडल गिर गया। वह काफी देर तक उसे वहां ढूंढ़ती रहीं। ढूंढ़ते-ढूंढ़ते जब वह थक गईं तो उन्होंने क्रोध में कह दिया कि यह घाट हमेशा जलता रहेगा।
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