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Monday, January 12, 2026

कैसे ग्लोबल रिजर्व करेंसी बना डॉलर, इससे पहले किस करेंसी का था बोलबाला?

नई दिल्ली। आज अमेरिकी dollar ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम के ठीक सेंटर में है। सरकारें इसे अपने रिजर्व में रखती हैं, इंटरनेशनल ट्रेड में इसकी कीमत तय होती है और साथ ही ग्लोबल मार्केट इसकी मजबूती या फिर कमजोरी के साथ चलते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि दुनिया के रिजर्व करेंसी बनने का डॉलर का सफर आखिर कैसा था।

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दरअसल दूसरे विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका ने सहयोगी देशों को हथियार, खाना और सामान सप्लाई किया था। ज्यादातर पेमेंट सोने में किए गए थे। जिस वजह से अमेरिका युद्ध खत्म होने तक दुनिया के लगभग दो तिहाई सोने के रिजर्व जमा कर पाया था। 13वीं सदी तक, सोना यूरोप में मुख्य करेंसी के तौर पर उभरा और 1971 तक अपनी जगह बनाए रखी। सोने और चांदी का इस्तेमाल इंटरनेशनल सेटलमेंट के लिए किया जाता था।

1944 में 44 देश के लीडर ब्रिटेन वुड्स में मिले और उन्होंने अपनी करेंसी को सीधे सोने के बजाय अमेरिकी डॉलर से जोड़ने पर अपनी सहमति दिखाई। इसके बदले में अमेरिका ने डॉलर को $35 प्रति औंस की दर से सोने में बदलने का वादा किया। डॉलर से पहले ब्रिटिश पाउंड दुनिया की एक प्रमुख मुद्रा थी।

एक मामले में Pound सोने से भी बेहतर था, क्योंकि स्टर्लिंग पाउंड रिजर्व को लंदन में इन्वेस्ट किया जा सकता था और इस तरह ब्याज कमाया जा सकता था। उन्नीसवीं सदी में और 1914 तक, लंदन, दुनिया के बैंकिंग सेंटर के तौर पर, किसी भी दूसरे फाइनेंशियल सेंटर की तुलना में बचत के ज्यादा तरीके दे सकता था। इसके अलावा, स्टर्लिंग पाउंड रखने का रिस्क,सोना रखने के रिस्क से ज्यादा था, फिर भी बहुत कम था और समय के साथ यह डॉलर के लिए भी सच हो गया।

Tag: #nextindiatimes #Dollar #GlobalReserveCurrency

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