डेस्क। बॉलीवुड एक्टर धर्मेंद्र इस वक्त ventilator पर हैं और उनकी हालत नाजुक है। वेंटिलेटर का आविष्कार चिकित्सा जगत की सबसे बड़ी क्रांतियों में से एक था लेकिन उससे पहले इलाज का तरीका जानकर आप हैरान रह जाएंगे। आज वेंटिलेटर आधुनिक चिकित्सा की रीढ़ बन चुका है।
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वेंटिलेटर वो मशीन है जो इंसान को मौत के मुहाने से खींच लाती है लेकिन सवाल उठता है कि जब ये मशीन नहीं थी, तब लोग सांस रुकने या फेफड़ों के फेल होने पर कैसे जिंदा बचते थे? 20वीं सदी से पहले डॉक्टर मैनुअल रेस्पिरेशन यानी हाथ से सांस देने की तकनीक अपनाते थे। इसमें डॉक्टर मरीज के फेफड़ों में हवा भरने के लिए मुंह या एक विशेष ट्यूब का इस्तेमाल करते थे।
इसे माउथ-टू-माउथ रेसुसिटेशन या बेलोज टेक्निक कहा जाता था। बेलोज तकनीक में एक छोटा पंप या चमड़े का थैला होता था, जिसे दबाकर मरीज के फेफड़ों में हवा भेजी जाती थी। हालांकि यह तरीका सीमित समय के लिए ही काम करता था और कई बार ज्यादा दबाव से फेफड़े फटने का खतरा भी रहता था।

वेंटिलेटर की असली कहानी शुरू होती है 1928 में, जब अमेरिकी वैज्ञानिक फिलिप ड्रिंकर और लुई एगासीज शॉ ने पहला ‘आयरन लंग’ यानी लोहे का फेफड़ा बनाया था। यह एक बड़ा धातु का सिलेंडर था, जिसमें मरीज को गर्दन तक रखा जाता था। मशीन बाहरी प्रेशर से मरीज के सीने को फैलाकर और सिकोड़कर सांस लेने में मदद करती थी। इसने पहली बार दुनिया को दिखाया कि मशीन भी इंसान की सांसें चला सकती है। इसके बाद 1950 के दशक में “पॉजिटिव प्रेशर वेंटिलेटर” आए, जो सीधे मरीज की नली में हवा भेजकर फेफड़ों को काम करने में मदद करते थे।
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