नई दिल्ली। भारत और China के बीच के रिश्ते हमेशा से चर्चा का विषय रहे हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब भारत के राजदूत बीजिंग कदम रखते हैं, तो उनकी पहचान में एक बड़ा बदलाव आता है? यह बदलाव उनके काम करने के तरीके में नहीं, बल्कि उनके नाम में होता है।
यह भी पढ़ें-इजरायल-ईरान के युद्ध से इन देशों को मिला बंपर फायदा, कर रहे खूब कमाई
हाल ही में चीन में भारत के नवनियुक्त राजदूत विक्रम दोरईस्वामी ने अपना एक चीनी नाम वेई जियामेंग रखा है। यहां ‘वेई’ एक ऐतिहासिक उपनाम है जो चीन के प्राचीन साम्राज्य से जुड़ा है। वहीं ‘जिया’ का अर्थ वृद्धि करना और ‘मेंग’ का अर्थ गठबंधन या संधि से है।इस नाम का एक गहरा संदेश यह भी हो सकता है कि वे दोनों देशों के बीच गठबंधन को मजबूती देने वाले दूत के रूप में आए हैं।

चीनी नाम अपनाने का यह सिलसिला आज का नहीं है बल्कि यह दशकों पुराना है। जब 1950 के दशक की शुरुआत में भारत ने चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए थे, तब पहले भारतीय राजदूत को भी एक चीनी नाम दिया गया था। उस समय इसे ‘पैन एन जी’ के रूप में जाना गया। तब से लेकर आज तक जो भी राजदूत चीन जाता है, वह इस सांस्कृतिक प्रक्रिया का हिस्सा बनता है।
दुनिया भर के कई बड़े देशों के राजदूत, बिजनेसमैन और विद्वान चीन में काम करने के दौरान अपनी पहचान को वहां की भाषा के अनुसार ढाल लेते हैं। चीनी भाषा ‘टोनल’ यानी सुरों पर आधारित होती है और विदेशी नामों का उच्चारण करना वहां के लोगों के लिए बहुत कठिन होता है। ऐसे में एक स्थानीय नाम अपनाने से बातचीत सरल हो जाती है और स्थानीय प्रशासन के साथ काम करना आसान हो जाता है।
Tag: #nextindiatimes #China #ambassador




