डेस्क। मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव के दौरान लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर भारत जैसे कुछ देश ईंधन के लिए दूसरे देशों पर निर्भर क्यों है? तेल (Oil) या फिर पेट्रोल सिर्फ कुछ ही जगहों पर क्यों पाया जाता है और यह जमीन के नीचे कैसे बनता है?
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तेल बनने की प्रक्रिया काफी ज्यादा लंबी और धीमी होती है। इस प्रक्रिया को जीवाश्म ईंधन निर्माण के नाम से जाना जाता है। लगभग 30 से 40 करोड़ साल पहले प्लैंकटन जैसे सूक्ष्मजीव और समुद्री पौधे मर गए और महासागरों की तलहटी में जमा हो गए। समय के साथ कीचड़, रेत और गाद की परतें इन अवशेषों के ऊपर जम गईं। जैसे-जैसे परतें जमा होती गई दबाव काफी बढ़ गया और पृथ्वी की अंदरूनी गर्मी ने भी इसमें एक बड़ी भूमिका निभाई।

ऑक्सीजन की गैर मौजूदगी में गर्मी और दबाव के इस मेल ने धीरे-धीरे दबे हुए जैविक पदार्थ को हाइड्रोकार्बन में बदल दिया। इससे कच्चा तेल बना। इस प्रक्रिया में लाखों साल लगते हैं। यही वजह है कि एक बार इस्तेमाल हो जाने के बाद तेल को जल्दी से दोबारा नहीं बनाया जा सकता। बनने के बाद तेल एक ही जगह पर रुका नहीं रहता। यह धीरे-धीरे चट्टानों से गुजरता है जब तक कि यह जमीन के नीचे बने भंडारों में फंस नहीं जाता। यह भंडार प्राकृतिक भंडारण स्थलों की तरह काम करते हैं।
वैश्विक स्तर पर वेनेजुएला, सऊदी अरब, रूस और इराक जैसे देशों में तेल का सबसे बड़ा भंडार मौजूद है। भारत में तेल राजस्थान के बाड़मेर, गुजरात के खंभात, मुंबई हाई, असम के डिगबोई और कृष्णा गोदावरी बेसिन जैसे क्षेत्रों में पाया जाता है।
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