डेस्क। अभी शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच जो खींचतान चल रही है, वो उसी इतिहास का नया अध्याय है, जिसे शंकराचार्य ने ही बनाया था क्योंकि Shankaracharya कोई एक शख्स नहीं बल्कि एक पदवी है, जिसे धारण करने वाला हिंदुत्व का सबसे बड़ा पुरोधा होता है और उसे कोई भी धर्म के आधार पर चैलेंज नहीं कर सकता, लेकिन इतिहास में कई ऐसे मौके आए हैं जब शंकराचार्यों ने सीधे सत्ता को चुनौती दी है और उसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा है।
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एक ऐसी ही कहानी तमिलनाडु की भी है, जब जयललिता के मुख्यमंत्री रहते हुए शंकराचार्य पर न सिर्फ हत्या के आरोप लगे थे, बल्कि उनकी गिरफ्तारी भी हुई थी और उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। वह भी दीपावली के दिन। यह किस्सा है तमिलनाडु की ‘अम्मा’ जयललिता और कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती का।
तारीख थी 11 नवंबर 2004; उस दिन पूरा देश दीपावली मना रहा था। तब कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य हुआ करते थे जयेंद्र सरस्वती। उस दिन वो आंध्रप्रदेश के महबूबनगर में थे और दीपावली की विशेष त्रिकाल पूजा की तैयारी कर रहे थे। अचानक से तमिलनाडु की पुलिस उनके मठ पहुंची और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। विशेष विमान से उसी रात उन्हें चेन्नई लाया गया और फिर वेल्लोर की सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया।

इस गिरफ्तारी के पीछे की वजह बेहद चौंकाने वाली थी। पुलिस ने शंकराचार्य को एक हत्या की साजिश का मुख्य आरोपी बनाया था। यह हत्या शंकर रमन की हुई थी, जो कांचीपुरम मंदिर के मैनेजर थे। 3 सितंबर 2004 को मंदिर परिसर में ही उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। शंकर रमन ने मठ के कामकाज और वित्तीय घोटालों को लेकर कई गुमनाम चिट्ठियां सरकार को लिखी थीं। पुलिस का दावा था कि इसी खुन्नस में शंकराचार्य ने यह हत्या करवाई। इस कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट राजनीति का था। जयललिता, जो कभी शंकराचार्य को अपना गुरु मानती थीं, अचानक उनकी दुश्मन बन गईं।
दरअसल 2004 लोकसभा चुनाव में जब वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की हार हो गई और मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी तो उस सरकार में साझीदार करुणानिधि की डीएमके भी थी, जो जयललिता के धुर विरोधी थे। उस वक्त शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती और यूपीए सरकार के बीच नज़दीकियां बढ़नी शुरू हो गईं। यूपीए और खास तौर से डीएमके के कई नेता आशीर्वाद लेने के लिए शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती के कांची कामकोटि पीठ में हाजिरी लगाने लगे।
इससे जयललिता नाराज हो गईं। बाकी जयेंद्र सरस्वती के पीठ में नेताओं की बढ़ती हाजिरी से जयललिता को ये भी लगने लगा कि कांची कामकोटि पीठ अब सत्ता का समानांतर केंद्र बनता जा रहा है, जिसकी वजह से उनकी कुर्सी कभी भी खतरे में पड़ सकती है। बाकी जयललिता अपनी सॉफ्ट हिंदुत्व वाली छवि से भी निकलने की कोशिश कर रही थीं, जिसकी वजह से उन्हें लोकसभा चुनाव में भी नुकसान हो गया था। जयललिता ने सख्ती बरती। अपनी इमेज सुधारने की कोशिश में अपने जीवन के सबसे सख्त फैसलों में से एक कर लिया और तमिलनाडु पुलिस को शंकराचार्य की गिरफ्तारी की छूट दे दी और शंकराचार्य गिरफ्तार हो गए।
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