डेस्क। अगर आप स्टॉक मार्केट को फॉलो करते हैं तो आपने ‘मार्केट बुलिश हो गया’ या ‘इन्वेस्टर्स को बेयर फेज का डर है’ जैसी बातें जरूर सुनी होंगी। असल में ‘Bull’ और ‘बेयर’ मार्केट की दिशा, इन्वेस्टर की सोच और भविष्य की कीमतों के बारे में बताते हैं। आइए जानते हैं क्या होता है इन शब्दों का मतलब और कहां से हुई इनकी शुरुआत?
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बुल मार्केट एक ऐसी स्थिति के बारे में बताता है जहां पर स्टॉक की कीमतें बढ़ रही हैं या फिर आने वाले समय में बढ़ने की उम्मीद है। ऐसे समय में इन्वेस्टर्स मुनाफा कमाने की उम्मीद में स्टॉक खरीदने को तैयार रहते हैं। आर्थिक विकास, कंपनियों की मजबूत कमाई, स्थिर सरकारी नीति और सकारात्मक वैश्विक संकेत आमतौर पर बुल मार्केट को सपोर्ट करते हैं। बुल हमेशा अपने सींगों को ऊपर की तरफ धकेल कर हमला करता है। शेयर मार्केट में भी ऊपर की तरफ बढ़ती गति को ऊपर की तरफ दर्शाती हैं।

बेयर मार्केट बुल मार्केट का उल्टा होता है। यह एक ऐसे फेज को बताता है जहां पर स्टॉक की कीमतें गिर रही हैं या फिर गिरने की उम्मीद है। ऐसे समय में इन्वेस्टर्स नुकसान से बचने के लिए स्टॉक बेचते हैं। बेयर मार्केट अक्सर आर्थिक मंदी, फाइनेंशियल संकट और भू राजनीतिक तनाव के साथ-साथ कंपनियों के खराब प्रदर्शन की वजह से शुरू होते हैं।
बेयर भी हमेशा अपने पंजों से नीचे की तरफ वार करता है। यह नीचे गिरती हुई स्टॉक की कीमतों को दर्शाता है और इस वजह से इसे फाइनेंशियल मार्केट की गिरावट से जोड़ा गया। बुल मानते हैं कि अच्छे दिन आने वाले हैं और वह जोखिम लेने के लिए तैयार रहते हैं। वहीं बेयर मुसीबत की उम्मीद करते हैं।
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