नई दिल्ली। भारत में एक Leader ऐसे भी थे कि जब उनकी मृत्यु हुई थी तो उनका पार्थिव शरीर सिर्फ भारत के तरंगे में ही नहीं बल्कि इंडोनेशिया और रूस के राष्ट्रीय झंडे में भी लपेटा गया था। यह दुर्लभ सम्मान एक ऐसे जीवन को दर्शाता है जो घरेलू राजनीति से कहीं आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष, युद्धकालीन अभियान और कूटनीतिक सद्भावना को छूता था। हम बात कर रहे हैं बीजू पटनायक की।
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बीजू पटनायक भारतीय विमान चालक, स्वतंत्रता सेनानी और ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री थे। उनके जीवन के सबसे बड़े क्षणों में से एक 1947 में आया था। दरअसल इंडोनेशिया स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था। जवाहरलाल नेहरू के अनुरोध पर बीजू पटनायक ने कार्रवाई करते हुए युद्ध क्षेत्र में एक जोखिम भरा मिशन पूरा किया था।
इंडोनेशिया के साथ उनका रिश्ता उस मिशन से कहीं आगे तक फैला हुआ था।इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो उन पर काफी भरोसा करते थे। उन्होंने बीजू पटनायक से अपनी बेटी का नाम रखने का अनुरोध किया। बीजू पटनायक ने जो नाम रखा था वह था मेगावती सुकर्णोपुत्री। मेगावती बाद में इंडोनेशिया की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बीजू पटनायक ने सोवियत युद्ध प्रयास में भी योगदान दिया।

ओडिशा के मुख्यमंत्री के तौर पर बीजू पटनायक ने बुनियादी ढांचा तैयार करने और राज्य के भविष्य को संवारने पर खास ध्यान दिया। तीन राष्ट्रीय झंडों का यह दुर्लभ सम्मान उनके जीवन के तीन अलग-अलग अध्यायों का प्रतीक था। भारत उनके नेतृत्व और सेवा के लिए, इंडोनेशिया उनके साहसी बचाव अभियान और गहरे संबंधों के लिए और रूस युद्ध के समय उनके योगदान के लिए। उन्होंने पारादीप बंदरगाह और राउरकेला स्टील प्लांट जैसी परियोजनाओं को स्थापित करने में एक बड़ी भूमिका निभाई।
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