एंटरटेनमेंट डेस्क। 80 और 90 के दशक तक कव्वाली का आलम चरम पर था। कव्वाली को पसंद करने वाले मानते हैं कि इसकी आवाज जब कानों तक पहुंचती है सुकून का सिलसिला शुरू हो जाता है। हालांकि 50 और 60 के दशक में कव्वाली को लेकर खासा क्रेज नहीं था लेकिन वक्त ने बाजी पलटी और देश की पहली महिला कव्वाल के रूप में ऊभरकर सामने आईं शकीला बानो भोपाली (Shakeela bano Bhopali)।
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शकीला के घर में बचपन से ही शेर और शायरी का माहौल था। पापा और चाचा शायर थे तो ऐसे में शकीला को यहीं से शौक चढ़ गया। धीरे-धीरे वो कव्वाली करने लगीं। 70 के दशक तक वह इतनी मशहूर हो चुकी थीं कि उन्हें हर शहर में कव्वाली गाने के लिए बुलाया जाता था और वह भी उनकी मनचाही कीमत पर। एक वक्त तो ऐसा आया कि उनकी डिमांड इतनी बढ़ गई कि उनके पास कव्वाली और शोज करने का वक्त नहीं होता था।

शकीला बानो शौहरत हासिल कर चुकी थीं। इसी बीच साल 1984 में भोपाल में गैस त्रासदी हुई, जिसके बाद मानो हर तरफ हाहाकार मच गया। इस त्रासदी ने कई लोगों की जान ली तो भोपाल के ना जाने कितने लोग इसकी जद में आ गए। जहरीली गैस ने हजारों लोगों की जिंदगी में जहर घोला और इसका शिकार शकीला बानो भी हुईं। इस त्रासदी ने उनकी आवाज छीन ली और कई बीमारियां उन्हें दे दीं।
जैकी श्रॉफ और इंडस्ट्री के कुछ लोगों ने उनकी मदद भी की। हालांकि बाद में धीरे-धीरे सबकुछ तबाह होता चला गया। आर्थिक स्थित भी दिन ब दिन बद से बत्तर होती चली गई। आखिरकार 16 दिसंबर 2002 को उन्होंने सभी को अलविदा कह दिया।
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