डेस्क। दक्षिण भारतीय खान-पान की जब भी चर्चा होती है, तो सबसे पहले मन में नरम और सफेद इडली का ही विचार आता है। सांभर और चटनी के साथ परोसी जाने वाली इडली आज हर भारतीय घर के नाश्ते का अहम हिस्सा बन चुकी है, लेकिन क्या आपको पता है कि आपकी यह पसंदीदा डिश पूरी तरह भारतीय नहीं है?
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आधुनिक Idli की उत्पत्ति 7वीं से 12वीं शताब्दी के बीच इंडोनेशिया में हुई थी। उस समय इंडोनेशिया पर शैलेंद्र और संजय जैसे हिंदू राजवंशों का शासन था। ये राजा अक्सर अपनी छुट्टियों में या अपने लिए योग्य दुल्हन की तलाश में भारत आते थे। जब ये राजा भारत के दक्षिणी तटों पर पहुंचते थे, तो उनके साथ उनके शाही रसोइए भी आते थे। ये रसोइए अपने साथ भाप में खाना पकाने (स्टीमिंग) की अद्भुत तकनीक और फर्मेंटेशन का हुनर लेकर आए थे।

इसी सांस्कृतिक आदान-प्रदान के दौरान इंडोनेशियाई ‘केडली’ भारतीय रसोइयों के हाथों में पहुंचकर ‘इडली’ बन गई। इडली की उत्पत्ति को लेकर दिलचस्प थ्योरी अरब देशों से जुड़ी है।भारत के तटीय इलाकों में आकर बसे अरब व्यापारी केवल ‘हलाल’ भोजन ही करना पसंद करते थे। वे अक्सर चावल के आटे को चपटा करके भाप में पकाते थे और उसे नारियल की ग्रेवी के साथ खाते थे। इन व्यापारियों ने भारतीय रसोइयों को फर्मेंटेशन यानी खमीर उठाने की तकनीक सिखाई।
बाद में भारतीय रसोइयों ने इसमें देसी तड़का लगाते हुए उड़द की दाल का मिश्रण तैयार किया। इस तरह अरब की सादगी और इंडोनेशिया की तकनीक मिलकर आज की आधुनिक इडली के रूप में विकसित हुई। आज हम जो इडली खाते हैं, जिसमें चावल और दाल का सटीक मिश्रण होता है, वह रूप इसे काफी बाद में मिला।
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