डेस्क। प्यार और पसंद की आजादी किसी भी लोकतंत्र की पहचान होती है, लेकिन भारत जैसे पारंपरिक समाज में जब दो अलग-अलग धर्मों के लोग एक साथ रहने का फैसला करते हैं तो अक्सर उन्हें अपनों के ही विरोध का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या घर वालों के पास यह अधिकार (Legal Rights) है कि वे बालिग बच्चों की निजी जिंदगी में दखल दें?
यह भी पढ़ें-हर साल दहेज की शिकार होती हैं इतनी महिलाएं, आंकड़े देख हिल जाएगा आपका दिमाग
हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि कानून की नजर में अंतरधार्मिक लिव-इन रिलेशनशिप कोई अपराध नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया है कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी मर्जी से जीवन जीने का अधिकार देता है।कोर्ट ने कहा कि जब दो व्यक्ति बालिग हो जाते हैं, तो वे अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति के साथ रहने के लिए स्वतंत्र हैं।

अंतरधार्मिक जोड़ों का लिव-इन में रहना; कानून इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखता है। हाईकोर्ट ने इस मामले में बहुत गहरी बात कही है।अदालत ने कहा कि वह याचिकाकर्ताओं को हिंदू या मुस्लिम के चश्मे से नहीं देखती, बल्कि उन्हें दो ऐसे बालिग व्यक्तियों के रूप में देखती है जो अपनी स्वतंत्र इच्छा से एक साथ रह रहे हैं।
केवल धर्म अलग होने की वजह से किसी नागरिक को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है। जाति, संप्रदाय या लिंग के आधार पर भेदभाव करना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। अगर कोई जोड़ा शांतिपूर्वक एक साथ रहना चाहता है, तो समाज या परिवार को उनकी खुशियों में बाधा डालने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
Tag: #nextindiatimes #LegalRights #Law




