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Sunday, March 3, 2024

मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें महात्मा गांधी के नाम से जाना जाता है, ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख नेता थे। उनका जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को पोरबंदर, वर्तमान गुजरात, भारत में हुआ था।

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मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें महात्मा गांधी के नाम से जाना जाता है, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख नेता थे। 2 अक्टूबर, 1869 को पोरबंदर, गुजरात, भारत में जन्मे गांधी अहिंसक प्रतिरोध और सविनय अवज्ञा के प्रतीक बन गए। यहां उनके जीवन और उनके द्वारा चलाए गए प्रमुख आंदोलन का अवलोकन दिया गया है:-

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा:

लंदन में कानून की पढ़ाई (1888-1891): गांधी कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए और 1891 में उन्हें बार में बुलाया गया। इंग्लैंड में अपने समय के दौरान, वह विभिन्न संस्कृतियों और विचारधाराओं के संपर्क में आए।

प्रारंभिक सक्रियता:

दक्षिण अफ्रीका (1893-1914): गांधीजी की सक्रियता दक्षिण अफ्रीका में शुरू हुई, जहां उन्होंने एक वकील के रूप में काम किया। वह नस्लीय भेदभाव के खिलाफ भारतीय समुदाय के नागरिक अधिकार आंदोलन में शामिल हो गए। यह दक्षिण अफ्रीका में था कि उन्होंने पहली बार अहिंसक प्रतिरोध, या “सत्याग्रह” के सिद्धांतों को विरोध की एक विधि के रूप में नियोजित किया था।

भारत वापसी:

चंपारण सत्याग्रह (1917): भारत में गांधीजी का पहला बड़ा अभियान बिहार के चंपारण जिले में था, जहां नील किसानों को उनकी इच्छा के विरुद्ध नील की खेती करने के लिए मजबूर किया जा रहा था। गांधी के अहिंसक विरोध ने अधिकारियों को सुधार लागू करने के लिए मजबूर किया।
खिलाफत आंदोलन (1919-1922): गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के खिलाफ हिंदू-मुस्लिम एकता के साधन के रूप में ओटोमन खलीफा को संरक्षित करना था।

असहयोग आंदोलन (1920-1922):

जलियांवाला बाग नरसंहार की प्रतिक्रिया: गांधी ने जलियांवाला बाग नरसंहार के जवाब में असहयोग आंदोलन शुरू किया, जिसमें भारतीयों से ब्रिटिश संस्थानों, वस्तुओं और शिक्षा का बहिष्कार करने का आग्रह किया गया।
असहयोग की वापसी: अंततः 1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद आंदोलन वापस ले लिया गया, जहां प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए थे। गांधीजी अहिंसा में विश्वास करते थे और उन्होंने आंदोलन वापस ले लिया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-1934):

दांडी मार्च (1930): ब्रिटिश नमक एकाधिकार के विरोध में, गांधीजी ने अनुयायियों के एक समूह के साथ अरब सागर तक मार्च किया और समुद्री जल को वाष्पित करके नमक बनाया। इस प्रतीकात्मक कृत्य ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को प्रज्वलित किया।
ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार: भारतीयों से ब्रिटिश सामान खरीदने से इनकार करने और ब्रिटिश कानूनों के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध में भाग लेने का आग्रह किया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942):

“करो या मरो”: गांधीजी ने भारत में ब्रिटिश शासन को समाप्त करने की मांग करते हुए भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया। उनका प्रसिद्ध आह्वान “करो या मरो” था, जो भारतीयों को अंग्रेजों को बाहर निकालने के लिए किसी भी आवश्यक साधन का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करता था।

गिरफ्तारी और कारावास: इस आंदोलन के कारण व्यापक विरोध प्रदर्शन और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं, जिनमें गांधी की गिरफ्तारी भी शामिल थी।

विभाजन और स्वतंत्रता (1947):

स्वतंत्रता में भूमिका: गांधीजी ने 1947 में भारत की स्वतंत्रता के लिए हुई वार्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विभाजन का विरोध: गांधीजी ने भारत के दो अलग-अलग राष्ट्रों, भारत और पाकिस्तान में विभाजन का पुरजोर विरोध किया और हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने के लिए अथक प्रयास किया।

हत्या और विरासत:

हत्या (1948): दुखद बात यह है कि 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे, एक हिंदू राष्ट्रवादी, जो गांधी के दृष्टिकोण से असहमत था, ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी।

गांधी की विरासत शांति, अहिंसा और न्याय के लिए संघर्ष के वैश्विक प्रतीक के रूप में जीवित है। अहिंसक प्रतिरोध का उनका दर्शन दुनिया भर में नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए आंदोलनों को प्रेरित करता है।

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