डेस्क। दिल्ली में प्रदूषण के बढ़ते स्तर को देखते हुए मौजूदा सरकार ने कृत्रिम बारिश कराने का निर्णय लिया है। कृत्रिम बारिश का पहला परीक्षण भी आज संभव माना जा रहा है। कृत्रिम वर्षा या artificial rain से मतलब एक विशेष प्रक्रिया द्वारा बादलों की भौतिक अवस्था में कृत्रिम तरीके से बदलाव लाना होता है, जो वातावरण को बारिश के अनुकूल बनाता है।
यह भी पढ़ें-क्या होती है क्लाउड सीडिंग, जानिए इसमें कितना आता है खर्च?
पहले चरण में रसायनों का इस्तेमाल करके वांछित इलाके के ऊपर वायु के द्रव्यमान को ऊपर की तरफ भेजा जाता है, जिससे वे बादल बना सके। इस प्रक्रिया में कैल्शियम क्लोराइड, कैल्शियम कार्बाइड, कैल्शियम ऑक्साइड, नमक और यूरिया के यौगिक और यूरिया और अमोनियम नाइट्रेट के यौगिक का प्रयोग किया जाता है। यौगिक हवा से जलवाष्प को सोख लेते हैं और संघनन की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं।

वहीं, दूसरे चरण में बादलों के द्रव्यमान को नमक, यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट, सूखी बर्फ और कैल्शियम क्लोराइड का प्रयोग करके बढ़ाया जाता है। तीसरे चरण की प्रक्रिया तब की जाती है, जब या तो बादल पहले से बने हुए हों या मनुष्य द्वारा बनाए गए हों। इस चरण में सिल्वर आयोडाइड और सूखी बर्फ जैसे ठंडा करने वाले रसायनों का बादलों में छिड़काव किया जाता है।
इससे बादलों का घनत्व बढ़ जाता है और सम्पूर्ण बादल बर्फीले स्वरुप में बदल जाते हैं और वे इतने भारी हो जाते हैं कि और कुछ देर तक आसमान में लटके नही रह सकते हैं तो बारिश के रूप में बरसने लगते हैं। सिल्वर आयोडाइड को निर्धारित बादलों में प्रत्यारोपित करने के लिए हवाई जहाज, विस्फोटक रौकेट्स या गुब्बारे का प्रयोग किया जाता है। कृत्रिम वर्षा कराने के लिए इसी प्रक्रिया का सबसे अधिक प्रयोग किया जाता है।
Tag: #nextindiatimes #artificialrain #CloudSeeding




