डेस्क। मिडिल ईस्ट की धरती एक बार फिर बारूद के ढेर पर है और इस बार टकराव की तीव्रता पहले से कहीं अधिक घातक है। अमेरिका और इजरायल द्वारा Iran पर किए गए संयुक्त हमलों ने इस क्षेत्र के समीकरणों को पूरी तरह बदल कर रख दिया है।
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ईरान के सबसे करीबी और ताकतवर सहयोगियों में रूस का नाम सबसे ऊपर आता है। दोनों ही देश वैश्विक राजनीति में अमेरिका के बढ़ते प्रभाव के कट्टर विरोधी हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और ईरान दशकों से इसी स्थिति में है।रूस ने अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों की अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कड़ी आलोचना की है।

हालांकि रूस ने सीधे तौर पर युद्ध में अपनी सेना नहीं उतारी है लेकिन वह ईरान को तकनीकी सहयोग और हथियारों की गुप्त आपूर्ति के जरिए मजबूत बनाए हुए है। चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार है।चीन आज भी ईरान से बड़े पैमाने पर सस्ता कच्चा तेल खरीद रहा है, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाया जा सका है। इसके अलावा पाकिस्तान, सीरिया, उत्तर कोरिया और बेलारूस भी ईरान के मातहत हैं।
दूसरी ओर अमेरिका और इजरायल के पक्ष में दुनिया की सबसे बड़ी ताकतें एकजुट हो गई हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड और जापान जैसे देशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर ईरान की हरकतों की कड़ी निंदा की है। ये देश होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सैन्य और कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं। इन देशों का समर्थन केवल सैन्य नहीं है, बल्कि वे वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए भी काम कर रहे हैं।
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