एंटरटेनमेंट डेस्क। संजय लीला भंसाली की हीरामंडी में एक गाना ऐसा भी था जिसे एक तवायफ ने बनाया था। इसकी कहानी शुरू होती है भारत की आजादी के साथ, जिसके बाद आम लोगों की जिंदगी के साथ-साथ तवायफों की जिंदगी पर भी बड़ा असर पड़ा था क्योंकि इसके बाद उनके पेशे पर पाबंदी लगा दी गई थी, जिसके चलते उन्होंने AIR का रास्ता अपनाया।
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ये रास्ता उतना आसान नहीं था क्योंकि AIR ने एक शर्त रखी थी-मैरिज सर्टिफिकेट। अगर कोई तवायफ ऑल इंडिया रेडियो से अपनी कला दिखाना चाहती है तो उन्हें अपना मैरिज सर्टिफिकेट दिखाना पड़ेगा। हालांकि रसूलन बाई जो कि बनारस घराने की एक मशहूर हिंदुस्तानी क्लासिक सिंगर थीं, ने शादी की और एआईआर में अपनी आवाज दी। उन्होंने 1948 में तवायफ का पेशा छोड़कर वाराणसी के एक व्यापारी से शादी की।

रसूलन बाई की कहानी बनारस घराने की एक मशहूर हिंदुस्तानी क्लासिकल सिंगर की दिल को छू लेने वाली कहानी है, जो अपनी भावपूर्ण ठुमरी, दादरा और कजरी के लिए जानी जाती थीं। वह गरीबी और तवायफ परंपरा से निकलकर एक मशहूर कलाकार बनीं, आखिरकार अपना कोठा छोड़कर शादी की और बाद में मुश्किलों का सामना किया, जो आजादी के बाद के भारत में कलाकारों की बदलती किस्मत को दिखाती है।
हीरामंडी के गीत फूल गेंदवा ना मारो, लागत करेजवा में चोट को रसूलन बाई ने 1935 में गाया था। यह पारंपरिक गीत बनारस घराने की शैली में गाया और बाद में अन्य कलाकारों ने इसे दोहराया जैसे मन्ना डे और हीरामंडी वेब सीरीज में। उन्हें 1957 में भारत की नेशनल एकेडमी ऑफ म्यूजिक, डांस और थिएटर, संगीत नाटक अकादमी द्वारा हिंदुस्तानी संगीत गायन में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
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