नई दिल्ली। आज लेफ्ट (वामपंथ) और राइट (दक्षिणपंथ) शब्द हम अक्सर राजनीति में सुनते हैं। भारत में जहां मार्क्सवादी सोच वाली पार्टियों को वामपंथी कहा जाता है; वहीं परंपरा, संस्कृति और राष्ट्रवाद पर जोर देने वाली पार्टियों को दक्षिणपंथी कहा जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन शब्दों की शुरुआत कैसे हुई?
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दरअसल इनके जन्म की कहानी बड़ी दिलचस्प है। 1789 में राजा लुई XVI का शासन था और देश में नया संविधान बनाने के लिए एक सभा बैठी थी। सभा में यह बहस चल रही थी कि राजा को कितनी शक्ति दी जाए। इसी मुद्दे पर सदस्य दो हिस्सों में बंट गए। जो लोग राजा और राजशाही के समर्थक थे, वे सभा के राइट ओर बैठ गए। जो लोग राजशाही के विरोधी और बदलाव चाहते थे, वे Left ओर बैठ गए। यहीं से राइट (राइट ओर) और लेफ्ट (लेफ्ट ओर) शब्द पैदा हुए।

लेफ्ट ओर बैठने वाले लोग बदलाव, समानता और जनता के अधिकारों की बात करते थे। राइट ओर बैठने वाले लोग परंपरा, व्यवस्था और स्थिरता को महत्व देते थे। धीरे-धीरे अखबारों और लोगों ने इन शब्दों का यूज राजनीतिक सोच के लिए करना शुरू कर दिया। जब नेपोलियन बोनापार्ट का शासन आया, तब कुछ समय के लिए लेफ्ट और राइट का यूज कम हो गया लेकिन 1814 में जब फ्रांस में फिर से संवैधानिक राजशाही आई, तब ये शब्द दोबारा चलन में आ गए।
19वीं सदी तक ये शब्द पूरी तरह राजनीतिक विचारधाराओं के प्रतीक बन चुके थे। फ्रांस से शुरू हुआ यह विचार धीरे-धीरे पूरे यूरोप और फिर दुनिया में फैल गया। आज वामपंथ समानता और सामाजिक सुधार पर जोर देता है, जबकि दक्षिणपंथ परंपरा, व्यवस्था और सीमित सरकारी हस्तक्षेप को महत्व देता है।
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