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Tuesday, February 10, 2026

अंधे भी देखते थे फिल्में, पढ़ें पहली रंगीन फिल्म बनाने वाले सिनेमा के ‘भीष्म पितामह’ की कहानी

एंटरटेनमेंट डेस्क। Cinema का एक सितारा जो अपनी आवाज में कोई संवाद बोलता तो मानो सिनेमाघरों की दीवारें भी कंपा उठती थीं और दिल को थामकर बैठ जाते थे दर्शक, पर क्या आप जानते हैं कि भारतीय सिनेमा का वो ‘भीष्म पितामह’, जिसने सोने की थाली में खाना खाया, शौहरत के शिखर पर वह बैठा रहा, यहां तक कि अपनी फिल्मों से उसने हॉलीवुड को भी नतमस्तक कर दिया।

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हिंदी सिनेमा के युग की शुरूआत करने का श्रेय एक सोहराब मोदी को भी जाता है। अभिनेता, निर्देशक और निर्माता, सोहराब मोदी ने जिस किरदार को निभाया बहुत बखूबी निभाया। सोहराब मोदी की ज़िंदगी किसी फिल्मी ट्रेजेडी से भी कहीं ज्यादा भयानक और हकीकत से भरी है।

सोहराब मोदी का जन्म 1897 में मुंबई में हुआ। कहा जाता है कि उनके पिता नवाबों की देख-रेख किया करते थे। ऐसे में सोहराब की हिंदी और उर्दू काफी अच्छी थी। सोहराब के 12 भाई-बहन थे। पढ़ाई खत्म करने के बाद सोहराब अपने भाई के साथ ट्रैवलिंग एग्जिबिटर का काम करने लगे। उनके भाई ने इसी के चलते एक थिएटर कंपनी की शुरूआत की, जिसके चलते वो अलग-अलग शहरों में फिल्में दिखाते थे।

सोहराब की आवाज़ बचपन से ही इतनी भारी और रौबदार थी कि लोग उन्हें देखने के लिए रुक जाते थे। सोहराब मोदी उन एक्टर्स और फिल्ममेकर्स की फेहरिस्त में शुमार थे, जो हमेशा से ही कुछ बड़ा करना चाहते थे। इसी जुनून ने उन्हें ‘झांसी की रानी’ बनाने के लिए प्रेरणा दे डाली। इस फिल्म से वो कंगाली की कगार पर आ गए और उन्हें अपना स्टूडियो और बंगला तक बेचना पड़ा। कहा जाता है कि सोहराब मोदी की फिल्में अंधे तक देखने आते थे।

Tag: #nextindiatimes #Cinema #SohrabModi

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