नई दिल्ली। लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस पूरी हो चुकी है, लेकिन एक सवाल अब भी है। जिस जवाब का इंतजार पूरे सदन को था, वह आया ही नहीं। तय समय, तय तारीख और तय उम्मीदों के बावजूद प्रधानमंत्री का संबोधन नहीं हो सका और आखिरकार धन्यवाद प्रस्ताव पारित भी हो गया। ऐसे में अब बहस इस बात पर है कि क्या संसद प्रधानमंत्री के जवाब के बिना भी पूरी मानी जा सकती है? आइए समझें।
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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 87 के तहत हर साल संसद के बजट सत्र की शुरुआत President’s speech से होती है। यह अभिभाषण औपचारिक जरूर लगता है लेकिन असल में यह सरकार की नीतियों, योजनाओं और आने वाले एजेंडे का आधिकारिक दस्तावेज होता है। राष्ट्रपति इसे पढ़ते हैं, लेकिन इसकी जिम्मेदारी सरकार की होती है। इसी अभिभाषण पर संसद में धन्यवाद प्रस्ताव लाया जाता है और उस पर चर्चा होती है।
संविधान की नजर से देखें तो प्रधानमंत्री का संबोधन अनिवार्य नहीं है। कहीं भी यह नहीं लिखा है कि धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस के बाद प्रधानमंत्री को ही जवाब देना होगा। संसद की कार्यवाही राष्ट्रपति के अभिभाषण, धन्यवाद प्रस्ताव और उस पर वोटिंग के साथ पूरी मानी जाती है। अगर प्रधानमंत्री किसी कारण से जवाब नहीं देते हैं तो भी धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया जा सकता है।

यह सवाल कानून से ज्यादा परंपरा और राजनीति से जुड़ा है। अब तक की संसदीय परंपरा में आमतौर पर प्रधानमंत्री ही धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस का अंतिम जवाब देते रहे हैं। इसे सरकार का सबसे आधिकारिक और निर्णायक पक्ष माना जाता है। प्रधानमंत्री का जवाब न आना विपक्ष के लिए यह कहने का मौका बन जाता है कि सरकार बहस से बच रही है।
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