नई दिल्ली। बीते कुछ समय में विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच तनाव काफी ज्यादा बढ़ चुका है। पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी और बाकी विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर वोट चोरी का आरोप लगाया था। वहीं हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ बैठक के बीच से वर्कआउट कर दिया। अब सवाल उठता है कि क्या भारत में किसी चीफ इलेक्शन कमिश्नर को पद से हटाया जा सकता है?
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दरअसल भारत की चुनाव मशीनरी की देखरेख इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया करता है। यह एक ऐसा निकाय है जिसे मौजूदा सरकार से आजाद होकर काम करने के लिए बनाया गया है। ऐसा इसलिए ताकि उन्हें राजनीतिक वजहों या फिर अस्थायी विवादों के लिए हटाए ना जा सके। Chief Election Commissioner को हटाना काफी मुश्किल है।

चीफ इलेक्शन कमिश्नर को सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी ही सुरक्षा मिलती है। चीफ इलेक्शन कमिश्नर को सिर्फ दो आधारों पर ही हटाया जा सकता है, पहला साबित दुर्व्यवहार और दूसरा अक्षमता। हटाने की प्रक्रिया महाभियोग जैसी ही है और इसमें सांसद कई चरणों में शामिल होती है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक प्रस्ताव पेश किया जाता है और इसे विशेष बहुमत से पास किया जाता है।
सदन के कुल सदस्यों का बहुमत और कम से कम दो तिहाई सदस्य मौजूद होने चाहिए और वोट करने चाहिए। दोनों सदनों द्वारा प्रस्ताव पास करने के बाद ही राष्ट्रपति चीफ इलेक्शन कमिश्नर को पद से हटा सकते हैं। बाकी इलेक्शन कमिश्नर के लिए नियम थोड़े अलग हैं। इलेक्शन कमिश्नर को सीधे महाभियोग जैसी सुरक्षा नहीं मिलती। इलेक्शन कमिश्नर को राष्ट्रपति तभी हटा सकते हैं जब चीफ इलेक्शन कमिश्नर उनके हटने की सिफारिश करें।
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