नई दिल्ली। हर साल Republic Day पर राष्ट्रपति की सवारी देश की सबसे खास झलकियों में गिनी जाती है। इस बार भी राष्ट्रपति ने जब यूरोपीय संघ के शीर्ष नेताओं के साथ जिस शाही बग्घी में सवार होकर कर्तव्य पथ पर प्रवेश किया, तो बग्घी ने लोगों की जिज्ञासा बढ़ा दी।
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यह बग्घी भारत के लोकतांत्रिक इतिहास जितनी ही पुरानी है और इसका सफर आजादी से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी कहती है। राष्ट्रपति की यह बग्घी अंग्रेजी दौर की विरासत है। कभी वायसराय इसी बग्घी में सवार होकर सरकारी कार्यक्रमों में पहुंचते थे। इसकी बनावट बेहद भव्य है। बग्घी पर सोने की परत चढ़ी हुई है और दोनों ओर भारत का राष्ट्रीय चिन्ह भी सोने से ही जड़ा हुआ है।

पहले इस बग्घी को छह ऑस्ट्रेलियाई घोड़े खींचते थे लेकिन अब परंपरा के अनुसार चार घोड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। 1947 में देश के बंटवारे के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच सिर्फ जमीन और सेना ही नहीं, बल्कि हर छोटी-बड़ी संपत्ति का बंटवारा हुआ। सरकारी इमारतों से लेकर सैन्य संसाधनों तक, सब कुछ नियमों के तहत बांटा गया। इसी प्रक्रिया में वायसराय की इस शाही बग्घी पर भी दोनों देशों ने दावा ठोक दिया।
विवाद इतना बढ़ गया कि कोई सीधा समाधान नहीं निकल पाया। आखिरकार फैसला हुआ कि टॉस के जरिए तय किया जाए कि बग्घी किसे मिलेगी। भारत की ओर से तत्कालीन राष्ट्रपति अंगरक्षक रेजिमेंट के पहले कमांडेंट लेफ्टिनेंट कर्नल ठाकुर गोविंद सिंह मैदान में उतरे, जबकि पाकिस्तान की तरफ से साहबजादे याकूब खान मौजूद थे। सिक्का उछला और किस्मत ने भारत का साथ दिया। टॉस भारत के पक्ष में गया और शाही बग्घी भारत के हिस्से आ गई।
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