नई दिल्ली। दिल्ली दंगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया गया है। पांच दूसरे आरोपियों को जमानत दे दी गई है। कोर्ट ने खालिद और इमाम को राहत देने से इनकार करने की बड़ी वजह यूएपीए की धारा 43D(5) को बताया। आइए जानते हैं कि यूएपीए क्या है और कब बना था?
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गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम जिसे आमतौर पर यूएपीए के नाम से जाना जाता है भारत का मुख्य आतंकवाद विरोधी और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून है। इसे उन गतिविधियों को रोकने के लिए बनाया गया है जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता के लिए खतरा हैं। इसमें अलगाववादी आंदोलन और आतंकवाद शामिल है।
UAPA को 1967 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान भारतीय संसद द्वारा लागू किया गया था। शुरुआत में है कानून गैर कानूनी और अलगाववादी गतिविधियों को निपटाने के लिए पेश किया गया था। इस कानून में 2004 में बड़ा बदलाव आया। पीओटीए को खत्म करने के बाद यूएपीए में आतंकवादी गतिविधियों की परिभाषा को औपचारिक रूप से जोड़ा गया। इसने इस कानून को भारत का मुख्य आतंकवादी विरोधी कानून बनाया।

इसके बाद 2008, 2012 और 2019 में भी कई संशोधन किए गए। 2019 में सरकार को न सिर्फ संगठनों बल्कि एक अकेले व्यक्ति को भी आतंकवादी घोषित करने की अनुमति मिली। 2019 के संशोधन के बाद कई विश्व स्तर पर पहचाने जाने वाले आतंकवादी यूएपीए के तहत आतंकवादी नामित किए जाने वाले पहले व्यक्तियों में से थे। इनमें हाफिज सईद, मसूद अजहर, जकी उर रहमान लखवी और दाऊद इब्राहिम शामिल थे। यूएपीए के तहत मामलों की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी या फिर विशेष राज्य पुलिस इकाइयों द्वारा की जाती है।
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