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Saturday, January 24, 2026

सभाओं से कितना अलग होता है रोड शो, दोनों में क्या है ज्यादा खर्चीला?

डेस्क। बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly election) के प्रचार में नेताओं को रोड शो खूब भा रहा है। यहां नेता जनसभा के साथ रोड शो में उतर रहे हैं। मतदाता भी अपने बीच नेताओं को देखकर खुश हो रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव से जोर पकड़ा यह ट्रेंड विधानसभा में भी पसंद किया जा रहा।

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पहले चरण के मतदान से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी वाड्रा, चिराग पासवान, तेजस्वी यादव, पवन सिंह, मनोज तिवारी, राजनाथ सिंह, शाहनवाज हुसैन जैसे कई नेता रोड शो कर चुके हैं। 11 नवंबर को दूसरे चरण के मतदान से पहले तक यह दौर जारी रहेगा।

जनसभा में लोग नेताओं को सुनने-देखने जाते हैं। वहां नेता भीड़ से संवाद तो करते हैं लेकिन सीमित अपील होती है। जनता पसंद और नापसंद के अनुसार सभाओं में जाती है, इसीलिए आजकल राजनीतिक दल बड़ी सभाओं से पहले जिलों में पार्टी संगठनों के माध्यम से लोगों को जुटाने और उन्हें सभा स्थल तक पहुंचने को प्रेरित करते हैं।

रोड शो की अलग प्रकृति होती है। डॉ. मुनेश्वर इसे राजनीतिक विज्ञान की भाषा में लीडर एट योर डोर (नेता आपके दरवाजे पर) बताते हैं। पिछले कुछ वर्षों से देश के चुनाव में रोड शो का क्रेज देखा जा रहा। इसमें एक रूट होता है। नेता आपके करीब होते हैं। प्रचार तंत्र के लिए अधिक से अधिक लोगों से मिलते हैं। उनके साथ पूरा काफिला होता है। पिछले लोकसभा चुनाव में भी नेताओं को सभाओं से अलग रोड शो करते देखा गया था, इस बार विधानसभा में देखा जा रहा। जनसभाओं की तुलना में यह कम खर्चीला है। 

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