नई दिल्ली। मतदान (Voting) एक संवैधानिक अधिकार है। इसी के साथ कोई भी नागरिक के इस अधिकार का इस्तेमाल करने की क्षमता में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। चाहे फिर हस्तक्षेप शारीरिक हो, मौखिक हो या फिर किसी भी तरीके से हो, यह चुनावी भ्रष्टाचार के अंदर आता है। भारतीय कानून इसे एक आपराधिक कृत्य मानता है।
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भारत में चुनावों को नियंत्रित करने के लिए एक बड़ा कानून बनाया गया है। इसका नाम है जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951। यह अधिनियम चुनाव संचालन के तरीके को तय करता है और चुनावी अपराधों को साफ तौर से परिभाषित करता है। इसमें रिश्वतखोरी, धमकी और किसी को मतदान करने से रोकना शामिल है। मतदाता की स्वतंत्रता में बाधा डालने वाला कोई भी काम भ्रष्ट आचरण माना जाता है और इसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाती है।

किसी मतदाता को रोकने का अपराध भारतीय न्याय संहिता की धारा 174 के अंतर्गत आता है। यह धारा चुनावों के दौरान अनुचित प्रभाव से संबंधित है। अगर किसी भी तरह से वोटर के मताधिकार में हेर फेर करने का कोई भी प्रयास किया जाता है तो 1 साल तक की कारावास, जुर्माना या दोनों की सजा दी जा सकती है।
किसी भी व्यक्ति को मतदान करने से रोकना, उसे किसी खास उम्मीदवार को वोट देने के लिए मजबूर करना या फिर उसे चुनावी प्रक्रिया में पूरी तरह से भाग लेने से रोकने के लिए बल, धमकी या दबाव का इस्तेमाल करना कानूनन जुर्म है। इसके लिए 1 साल तक की कैद, आर्थिक जुर्माना या फिर दोनों सजा दी जा सकती हैं। यह कानून राजनीतिक कार्यकर्ता, स्थानीय नेता, समूह या व्यक्ति और यहां तक कि निजी व्यक्ति पर लागू होता है।
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