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नारीवाद

परिवर्तन समाज का नियम है लेकिन जब हम सोच ही नहीं बदलेंगे तो परिवर्तन कहां से आएगा।

नारीवाद एक ऐसा विषय है जिसकी अपनी ही भिन-भिन प्रकार की परिभाषाए है, इसको सही स्तर पे जानना अति-आवश्यक है, क्यूकि ये किसी के सम्मान और भावनाओं से जुड़ा है, खैर हर कोई स्वतंत्र है कुछ भी कहे, चलिए बात करते है आखिर क्या है नारिवाद?

जीवन मे खुद के फ़ैसले लेने का अधिकार, पढ़ने लिखने का अधिकार, सुरक्षा और न्याए के अधिकार।

इसका अर्थ है नारी को भी पुरुष के जैसे ही समानता मिलनी चहिए, आइये इनके बारे मे विस्तार से जानते है।

नारी को पुरुष के जैसा सम्मान मिलना

हम लोग बचपन से देखते आ रहे है घर मे भी हमेशा भाइयों को ज़्यादा प्यार और स्नेह मिलता आ रहा है, जबकि बेटियों को उससे थोङा कम, लड़कों को बाहर जाने की आज़ादी, रात मे देर तक घूमना, और यहां तक कपड़ों मे भी भेदभाओं देखा हैं।

लड़कियों को पढ़ाई लिखाई की आज़ादी आज भी काई जगहों पर नहीं है, भारत में 70 प्रतिशात लडकियों की शादी 18 वर्ष के होते ही करा दी जाती हैं, उनको आज भी खुद के फ़ैसले लेने का हक़ नहीं है।  अगर आज भी देखा जाए तो लड़कियों को अधिक पढ़ाई लिखाई करने से भी यह समाज रोक देता है उनका मानना है, जब शादी ही होनी है तो इतनी पढ़ाई लिखाई का क्या मतलब, और यह बाहर की प्रभाव चीजे क्या संभालेंगी घर की संभाल ले वही काफी है।

आत्मनिर्भर जीवन जीना खुद मे गौरव की बात है, और यह आवश्यक भी है, खाना बनाना, कपड़े धोना या अन्या कोई घर का काम करना ये कोई अधिकार नही है किसी का, शायद यह स्त्री और पुरुष दोनों को ही आना चाहिए,  साथ मे काम करने से काम आसान ही होते है और कम समय में काम भी खत्म हो जाता हैं॥

आज हर छेत्र मे नारी आगे है। क्योकि वह भी समझती है वह नारी है, बेचारी नहीं॥

 


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