क्यों सुहागिने रखती है करवा चौथ का व्रत ? यहां जानें अखंड सौभाग्य के व्रत की महत्ता

कार्तिक मास की चतुर्थी तिथि में मनाए जाने वाले करवा चौथ पर्व के दिन स्त्रियां अपने पति की मंगल आयु एवं अखंड सुहाग की प्राप्ति के लिए व्रत करती हैं। यह पति-पत्नी के अखंड प्रेम और त्याग की चेतना का प्रतीक है। इस दिन महिलाएं दिन भर के व्रत के बाद ईश्वर से पति की मंगलकामना चाहती हैं। इस दिन चंद्रमा के साथ-साथ शिव-पार्वती, गणेश और कार्तिकेय की भी पूजा होती है। शिव और पार्वती की पूजा का अर्थ ही है- पार्वती जैसी शक्ति और साधना हासिल करना और पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना।

आज के समय में करवा चौथ स्त्री-शक्ति का प्रतीक-पर्व है।यदि हम करवा चौथ की प्रचलित कथाओं को देखें, तो इनमें स्त्रियोंको निरुपाय या असहाय नहीं, बल्कि सशक्त दिखाया गया है। पौराणिक कथाओं में भी स्त्रियां सशक्त भूमिका में नजर आती हैं और वे अपने पति और परिवार के लिए संकटमोचक बनकर उभरती हैं। जिस देश में सावित्री जैसे उदाहरण हैं, जिसने अपने पति सत्यवान को अपने सशक्त मनोबल से यमराज से छीन लिया था, वहां की स्त्रियां साहसी क्यों न हों।

करवा चौथ कथा

ऐसी ही एक कथा करवा चौथ को लेकर भी प्रचलित है। उसके अनुसार, प्राचीन समय में करवा नाम की एक स्त्री अपने पति के साथ एक गांव में रहती थी। उसका पति नदी में स्नान करने गया। नदी में नहाते समय एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया। उसने पत्नी को सहायता के लिए पुकारा।

करवा भागकर अपने पति के पास पहुंची और तत्काल धागे से मगरमच्छ को बांध दिया। उसका सिरा पकड़कर करवा पति के साथ यमराज के पास तक पहुंच गई। यमराज के साथ प्रश्न उत्तर के बाद करवा के साहस को देखते हुए यमराज को उसके पति को वापस करना पड़ा।

जाते समय उन्होंने करवा को सुख-समृद्धि के साथ वर भी दिया- ‘जो स्त्री इस दिन व्रत करके करवा को याद करेगी, उनके सौभाग्य की मैं रक्षा करूंगा।’ इस कथा में करवा ने अपने सशक्त मनोबल से अपने पति के प्राणों की रक्षा की। मान्यता है कि जिस दिन करवा ने अपने पति के प्राण बचाए थे, उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी थी।

व्रत रखने का अर्थ ही है संकल्प लेना। वह संकल्प चाहे पति की रक्षा का हो, परिवार के कष्टों को दूर करने का या कोई और। यह संकल्प वही ले सकता है, जिसकी इच्छा शक्ति मजबूत हो। प्रतीकात्मक रूप में करवा चौथ पर महिलाएं अन्न-जल त्याग कर यह संकल्प लेती हैं और अपनी इच्छा शक्ति की परख करती हैं। यह पर्व संकेत देता है कि स्त्री अबला नहीं, बल्कि सबला है और वह भी अपने परिवार को बुरे वक्त से उबार सकती है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

eighteen + 17 =

Back to top button