दुर्गाशंकर मिश्र को सौंपी गई मुख्य सचिव पद की जिम्मेदारी,लखनऊ से दिल्ली तक अपनी प्रशासनिक क्षमता को किया साबित

उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव की जिम्मेदारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर आवासन एवं शहरी विकास मंत्रालय में सचिव पद पर तैनात रहे दुर्गाशंकर मिश्र को सौंप दी गई है। इस संबंध में यूपी सरकार ने गुरुवार को आदेश जारी कर दिए हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1984 बैच के अधिकारी दुर्गाशंकर मिश्र उत्तर प्रदेश के 54वें मुख्य सचिव बनाए गए हैं। मिश्र राजधानी लखनऊ में लंबे समय तक विभिन्न पदों पर रहे हैं। वह आज मुख्य सचिव का कार्यभार ग्रहण कर सकते हैं।

पिछड़ेपन और माफियाराज के लिए बदनाम रहे पूर्वांचल में मऊ के मूल निवासी दुर्गाशंकर मिश्र को सेवा विस्तार देकर उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव जैसा बड़ा पद यूं ही नहीं दिया गया। मऊ की यह मेधा लखनऊ से दिल्ली तक अपनी प्रशासनिक क्षमता को साबित करती रही है। बसपा शासनकाल में प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री के रूप में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के भरोसेमंद रहे मिश्र सपा सरकार आने के बाद कुछ समय के लिए भले ही कम महत्व में रहे हों, लेकिन 2014 में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गए इन आइएएस अधिकारी ने उसी मेहनत और लगन से दिल्ली का भी दिल जीता और अब बड़ी भूमिका में यूपी लौटे हैं।

मूल रूप से मऊ के पहाड़ीपुर खिरिया निवासी दुर्गाशंकर मिश्र का जन्म चार दिसंबर, 1961 को हुआ। आइआइटी कानपुर से बीटेक करने वाले मिश्र एमबीए डिग्री धारक भी हैं। 1984 में आइएएस के लिए चयनित होकर 1985 में असिस्टेंट मजिस्ट्रेट के पद पर वाराणसी से नौकरी की शुरुआत की। राजधानी लखनऊ में पहली बार काम करने का मौका उन्हें 1988 में मिला, जब गृह विभाग में संयुक्त सचिव के रूप में तैनाती मिली।

1990 में ही लखनऊ के मुख्य विकास अधिकारी बने दुर्गाशंकर को प्रशासनिक क्षमता दिखाने के लिए जिलाधिकारी के रूप में सबसे पहले 1993 में सोनभद्र जिला मिला। इसके बाद कानपुर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष सहित विभिन्न पदों पर रहने के बाद 2002 में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने का मौका पहली बार मिला। सात वर्षों तक वहां सेवाएं देकर 2009 में उत्तर प्रदेश सचिवालय की सीढ़ियां चढ़े। 2009 में कर एवं पंजीयन विभाग के सचिव बनाए गए और फिर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की नजरों में आ गए। 2010 में वह मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव के रूप में पंचम तल पर पहुंच गए। 2012 तक इसी पद रहे मिश्र का प्रभाव का ग्राफ सत्ता परिवर्तन के साथ नीचे आ गया। जब सपा सरकार आते ही उन्हें प्रमुख सचिव लघु सिंचाई और फिर होमगार्ड विभाग के प्रमुख सचिव जैसे कम महत्व वाले विभागों में भेज दिया गया।

इस पर अध्ययनशील-लगनशील आइएएस अधिकारी 31 अक्टूबर, 2012 से अध्ययन अवकाश पर चले गए। 2014 में जब केंद्र में मोदी सरकार बनी तो वह वापस लौटे और फिर से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर चले गए। 10 जुलाई, 2014 को खनन मंत्रालय में संयुक्त सचिव बनाए गए दुर्गाशंकर इस पद पर कुछ दिन ही रहे और मोदी सरकार ने उन्हें अपर सचिव बनाकर आवासन एवं शहरी विकास मंत्रालय में भेज दिया, जहां अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए प्रधानमंत्री आवास योजना, अमृत योजना और स्मार्ट सिटी जैसी बड़ी परियोजनाओं को धरातल पर उतारने में जुट गए।

2017 में वह इसी विभाग में सचिव पद पर प्रोन्नत हो गए और तब से सरकार के क्षमतावान अधिकारी के रूप में छवि बनाकर सेवानिवृत्ति की दहलीज तक आ गए। इसी महीने के अंत यानी 31 दिसंबर को वह सेवानिवृत्त होने वाले थे, लेकिन विकास योजनाओं को रफ्तार देने में जुटी यूपी सरकार ने भी ऐसे अनुभवी अधिकारी की जरूरत को समझते हुए सेवा विस्तार देते हुए मुख्य सचिव पद पर यूपी काडर में वापसी का प्रस्ताव भेज दिया, जिसे केंद्र ने स्वीकृति भी दे दी।

बड़े ओहदों पर आइआइटियन्स : यह संयोग है कि उत्तर प्रदेश में इन दिनों सबसे अहम कुछ पदों पर आइआइटियन्स ही बैठे हैं। मुख्य सचिव बनाए गए दुर्गाशंकर मिश्र और अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश कुमार अवस्थी आइआइटी कानपुर के छात्र रहे हैं तो पुलिस महानिदेशक मुकुल गोयल ने आइआइटी दिल्ली से बीटेक किया है।

मोदी, मऊ और यूपी कनेक्शन : दुर्गाशंकर को सेवा विस्तार के साथ मुख्य सचिव बनाए जाते ही तमाम चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। इसे मोदी, मऊ और यूपी कनेक्शन नाम दिया जा रहा है। दरअसल, इससे पहले भारतीय प्रशासनिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में आए अरविंद कुमार शर्मा प्रधानमंत्री मोदी के बेहद खास अधिकारी माने जाते थे। वह मऊ के ही मूल निवासी हैं और इस समय विधान परिषद सदस्य व भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। इसी तरह दुर्गाशंकर मिश्र भी मऊ के ही रहने वाले हैं और मोदी के भरोसमंद अफसरों में शामिल हैं।

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