अचानक आने वाले खर्चों को मैनेज करने के लिए इन बातों का रखें ख़ास ख्याल 

कार्यकुशलता बहुत अच्छी चीज है, लेकिन कभी-कभी बड़े संकट का कारण बन जाती है। दुनियाभर में सेमीकंडक्टर की कमी की समस्या इन्हीं में से एक है। पर्सनल फाइनेंस के मामले में भी यह एक समस्या बन सकती है। निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे इसे ठीक से समझें और उचित निर्णय लें। इस समय पूरी दुनिया में कुछ चीजों की कमी देखी जा रही है, खासतौर पर सेमीकंडक्टर्स की। सवाल यह है कि इस समस्या का स्रोत कहां है? इसका जवाब है कार्यकुशलता।

यह चौंकाने वाली बात हो सकती है कि क्षमता या कार्यकुशलता भी कोई समस्या हो सकती है। लेकिन सच यह है कि आपके पर्सनल फाइनेंस के मामलों में भी कार्यकुशलता एक समस्या हो सकती है। मुझे इस बात को और स्पष्ट करने दीजिए। क्षमता या कार्यकुशलता क्या है? आम तौर पर इसका मतलब है कि कम से कम लागत के साथ अधिकतम उत्पादन हासिल किया जाए। यह सुनने में काफी अच्छा लगता है। हालांकि कोरोना ने कार्यकुशलता के नकारात्मक पहलू को उजागर किया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कार्यकुशल होने का मतलब है कि अब और क्षमता नहीं बची है और आप पूरी क्षमता के साथ काम कर रहे हैं।पिछले 18 माह में हमने अक्षमता की कीमत जानी है। इस महामारी के दौर में सबसे अधिक सक्षम लोग उतने सामने नहीं आए, जितने सबसे अधिक अक्षम लोग आए हैं। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। हम अक्षमता को एक नकरात्मक चीज के तौर देखने इतने आदी हो चुके हैं कि हम यह सोचते ही नहीं हैं कि बिजनेस या किसी सिस्टम के लिए इसका क्या मतलब है। मुझे याद है कि पिछले वर्ष जब कोरोना वायरस चीन तक ही सीमित था तो कुछ जानकार बता रहे थे कि जब भारत में वायरस फैलना शुरू करेगा तो प्राइवेट हास्पिटल में अतिरिक्त आइसीयू बेड नहीं मिलेंगे। ये जानकार असल में हास्पिटल और प्राइवेट हेल्थकेयर सेवा मुहैया कराने वालों के काम करने के तौर-तरीकों, या कहें कि सुस्ती से परिचित रहे होंगे।

इसलिए, दूसरे नजरिये से देखें तो हास्पिटल में बहुत ज्यादा आइसीयू बेड खाली होना अक्षमता है। ऐसी स्थिति का मतलब यह है कि बेड, रूम और उपकरणों व रखरखाव पर किया गया निवेश कोई राजस्व नहीं दे रहा है, वह बेकार है। बिजनेस के लिहाज से यही नजरिया सही है। लेकिन जब महामारी फैल जाए तो क्याा होगा? यही बहुत सी कंपनियों के साथ हो रहा है, बहुत से लोगों के साथ भी हो रहा है। बहुत सी कंपनियां ऐसे चलाई जा रही हैं कि सप्लाई चेन में एक छोटी बाधा को भी सहन करना मुश्किल है।

कंपनियों ने लागत, मार्जिन, कर्ज सब कुछ इस तरह से सटीक बिठा रखा है कि मामूली झटका भी उनके लिए बड़ा हो जाता है, संकट का रूप ले लेता है। दुर्भाग्य से बहुत से लोगों की हालत बिल्कुल यही है। उन्होंने अपनी पूरी कमाई इस तरह से बांट रखी है कि उनकी पूरी सैलरी आते ही ईएमआइ और अन्य खर्चों में चली जाती है। बहुत से लोग ऐसे हैं कि सैलरी आने के एक सप्ताह के भीतर उनके पास कुछ नहीं बचता है। ऐसे में इनकम में थोड़ी सी भी बाधा या अप्रत्याशित तौर पर बड़ा खर्च पूरे पर्सनल फाइनेंस को तहस-नहस कर देता है।

दिक्कत यह है कि बहुत से लोगों के पास इससे बेहतर करने की गुंजाइश ही नहीं है। हालांकि, बचत करने वाले बहुत से लोग क्षमता के इस मंत्र को अपने निवेश और भविष्य की वित्तीय जरूरतों के अनुमान में भी लागू करते हैं। मैंने देखा है कि बहुत से लोग आनलाइन कैलकुलेटर्स पर जाते हैं और यह डालते हैं कि उनको कितनी रकम की जरूरत है और इसके लिए कितना निवेश करना होगा। आम तौर पर इस तरह के कैलकुलेटर्स रिटर्न को लेकर बहुत ज्यादा आशावादी होते हैं। लेकिन आपकी जरूरतें बदल सकतीं हैं, कभी भी कुछ बहुत बुरा हो सकता है। निवेशकों को यह समझना चाहिए और निवेश को हमेशा उसी के अनुरूप बदलते रहना चाहिए।

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