Gandhi Jayanti 2021: ‘स्वच्छ भारत मिशन’ पर अधिकारियों का पलीता, स्वच्छता और विकास से कोसों दूर है यूपी का यह गांव

ग्रामीण बताते हैं कि गांव में पक्की सड़कें ना होने की वजह से बरसात के दिनों में गांव में रहना दूभर हो जाता है। गांव के छोटे-छोटे बच्चों को स्कूल जाने में सड़क ना होने की वजह से दिक्कतें होती हैं इस वजह से कई बच्चे स्कूल ही नहीं जाते हैं।

आज 2 अक्टूबर है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 152वीं जयंती। भारत समेत पूरे दुनिया में 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी का जन्मदिवस मनाया जाता है। स्‍वाधीनता के पूर्व ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ”स्वच्छ भारत” का सपना देखा था जिसके लिए वह चाहते थे कि भारत के सभी नागरिक एक साथ मिलकर देश को स्वच्छ बनाने के लिए कार्य करें। सार्वभौमिक स्वच्छता प्राप्त करने के लिए किए जा रहे प्रयासों में तेजी लाने और स्वच्छता पर ध्यान केंद्रित करने की मंशा से प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने दो अक्टूबर 2014 को ‘स्वच्छ भारत मिशन’ आरंभ किया। ‘स्वच्छ भारत मिशन’ ने पिछले सात सालों में बहुत कुछ पाया है। यह इस मिशन की बड़ी सफलता कही जा सकती है कि इस मिशन के तहत गांव स्तर पर साफ सफाई देखने को मिल रही है।

इस गांव का नाम है खुशालपुरा। गांव की खासियत और पिछड़ेपन का कारण है इस गांव का दो जिलों में समाहित होना। करीब 700 की आबादी वाले इस गांव का आधा क्षेत्र जनपद इटावा में लगता है और आधा क्षेत्र मैनपुरी में लगता है। गांव का जो हिस्सा जनपद मैनपुरी में आता है उसकी पंचायत भिरोड़ा, ब्लॉक बरनहाल, तहसील करहल है। इटावा वाले गांव की पंचायत आलई है, ब्ल़ॉक और तहसील जसवंतनगर है।    

गांव में पक्की सड़कें ना होने की वजह से गंदगी की भरमार रहती है। गांव के लोग समझ ही नहीं आते की शिकायत करें तो करें किससे? गांववाले बताते हैं कि गांव की कम आबादी होने और गांव की आबादी 2 जिलों में बटी होने की वजह से आज तक गांव से कोई ग्राम प्रधान भी नहीं चुना जा सका है और अधिकारियों का इसलिए इस गांव के विकास पर ध्यान नहीं जाता है। गांव में वोट की संख्या कम होने की वजह से भी ग्राम प्रधान हमारे गांव पर कम ध्यान देते हैं।

ग्रामीण बताते हैं कि गांव में पक्की सड़कें ना होने की वजह से बरसात के दिनों में गांव में रहना दूभर हो जाता है। गांव के छोटे-छोटे बच्चों को स्कूल जाने में सड़क ना होने की वजह से दिक्कतें होती हैं इस वजह से कई बच्चे स्कूल ही नहीं जाते हैं।21वीं सदी के भारत में खुसालपुरा गांव की यह तस्वीर विकास के नाम पर एक बदनुमा दाग ही है जिस को मिटाने के लिए अधिकारियों के प्रयास नाकाफी हैं और न ही यहां के नेता इस गांव की ओर कोई ध्यान दे रहे हैं। पिछड़ेपन की दास्तां कह रही खुसालपुरा गांव की सच्चाई यहां के लोगों की नियति बन चुकी है। जिस की पीड़ा ग्रामीणों के मुख से ही सुनी जा सकती है।

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