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लेखक की कलम से

मानव सभ्यता के लिए चुनौतीपूर्ण समय

मानव सभ्यता के सामने चुनौतियां आती-जाती रही हैं और विज्ञान की शोधों से मनुष्य ने बहुत सारे क्षेत्रों में उल्लेखनीय तरक्की की, लेकिन वर्तमान समय सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। एक तरफ पृथ्वी के पर्यावरण से सामंजस्य स्थापित करने की चुनौती है और दूसरी तरफ कोविड-19 जैसी महामारी से निपटने की चुनौती।

जहां पर्यावरण से संतुलन स्थापित करने की बात है, पृथ्वी सम्मेलन पर कार्बन उत्सर्जन को लेकर और पृथ्वी को ज्यादा गर्म होने से बचाने के लिए विश्व के सभी विकसित और विकासशील देश इकट्ठा होते रहे हैं, लेकिन उत्सर्जन के मामले में कमी करने का कोई समझौता विश्वव्यापी रूप नहीं ले पाया। इसका दुष्परिणाम समुद्र के गर्म होते जल स्तर से देखा जा सकता है। अभी बंगाल, उड़ीसा और बांग्लादेश में भयंकर अंफान तूफान इसकी एक बानगी है इसके तुरंत बाद मुंबई को छूता हुआ निकलता निसर्ग तूफान इसका दूसरा उदाहरण है।

इसके अतिरिक्त दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के बीच में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में आती कमजोरी न केवल उस क्षेत्र में अंतरिक्ष के शोधों को प्रभावित करेगी, अपितु ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचा सकती है और वहां पर स्थित सैटेलाइट भी अपना काम सही तरीके से करने में सक्षम नहीं हो सकेंगे इसकी पूरी आशंका है। 

लगता है प्रकृति इशारा कर रही है कि कहीं ना कहीं मानव और उसके बीच में सामंजस्य में कमी है। प्रकृति वही कर रही है जो मानव सभ्यता के अस्तित्व में आने से पहले कर रही थी, मानव की गतिविधियों से जो परिस्थिति बनी है, उसे सुधारने के लिए प्रकृत को दोष देना ठीक नहीं। यदि इसमें किसी का दोष है तो पूरी दुनिया के मानव समाज का, जो अपने आप को सबसे उन्नत मानता है लेकिन उसके ऐसे कितने कार्य हैं  जो मानव मानव के बीच में राग, द्वेष,वैमनस्य, आसमानता और बढ़ती जा रही खाई को मिटा दे! निश्चित रूप से इसका संतोषजनक उत्तर नहीं हो सकता अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है! लोकतांत्रिक दुनिया होने के बावजूद भी पूरी दुनिया के मानव समाज का वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए एक न हो पाना पर्यावरण संरक्षण को लेकर पूरी दुनिया के लिए एक स्पष्ट नीति ना बना पाना ,किस हद तक प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जाएगा?, वैज्ञानिक शोधों को किस सीमा तक गोपनीय रखने की जरूरत है और कहां पर वैज्ञानिक शोधों को साझा करने की जरूरत है? जिससे धरती पर रह कर यूनिवर्स में जीवन के बारे में खोज की जा सके। 

यह मानवीय प्रवृत्ति है जहां संसाधन अधिक मात्रा में सुलभ होते हैं और जीवन में चुनौतियां कम होती हैं वहां पर मानवीय जनसंख्या का घनत्व ज्यादा होता है। कमोबेश यही स्थिति पूरे विश्व के देशों में और उनके प्रदेशों देखी जा सकती है । जनसंख्या के बढ़ते दबाव के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ना लाजमी है ,इसके लिए अनुकूल जनसंख्या नीति विश्व के समस्त देशों के लिए जरूरी है।

यद्यपि वायरस जनित बीमारियां मनुष्य और अन्य जीव जंतुओं को नुकसान पहुंचाती रहे हैं लेकिन जब तक जंगलों के साथ छेड़छाड़ नहीं हुई थी तब तक काफी वायरस जंगली जानवरों से ही लड़ समाप्त हो जाते थे बस्तियों में इतने ज्यादा वायरस नहीं आ पाते थे लेकिन जंगलों के समाप्त होने से जंगली जानवरों के साथ यह वायरस भी साथ में आए हैं और मुसीबत हम सभी के सामने हैं। वर्तमान समय में वायरस का सबसे ज्यादा डर किसी को है तो मानव समाज को।

कोविड-19  ने पूरी मानव सभ्यता को चुनौती दे डाली है इस चुनौती से निपटने के लिए अब तक कोई ऐसी वैक्सीन नहीं बन पाई है और विश्व स्तर पर बढ़ते हुए मामले स्थिति बताते हैं कि हे मानव सभ्यता के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। इस चुनौती से निपटने के लिए विश्व स्तर पर सामूहिक और समन्वित प्रयास करने की आवश्यकता है।

जब तक इसका कोई समुचित समाधान ना हो तब तक बचाव के सभी उपाय आप अपने स्तर से करते रहें ।अनावश्यक रूप से कहीं आवागमन ना करें और प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने के लिए आयुर्वेदिक काढ़ा, गरम पानी, ग्रीन टी इत्यादि का प्रयोग बढ़ा दे। पौष्टिक आहार लें और योग और ध्यान को जीवन का हिस्सा बनाएं।

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(लेखक ब्रजेश शाक्य हैं। यह लेखक के अपने निजी विचार हैं। लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं एवं अर्थशास्त्र और पर्यावरण विषय पर बेहतरीन लेखन का अनुभव रखते हैं)


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