देहरादून में मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए खोले गए जन औषधि केंद्र

मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए जन औषधि केंद्र खोले गए हैं। राज्य में भी 217 जन औषधि केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। जिनमें 71 सरकारी और 146 निजी केंद्र हैं। पिछले कुछ वर्षों में केंद्रों की संख्या बढ़ी है, पर चिकित्सकों की वजह से दवा की डिमांड कम है। अफसोस, चिकित्सकों की मनमानी के चलते अधिकांश जन औषधि केंद्र सूने पड़े हैं। जबकि, यहां मरीजों के लिए बाजार दर से बेहद कम कीमत पर हर मर्ज की दवाएं उपलब्ध हैं।

सरकारी अस्पतालों में अधिकारी बार-बार यह दावा करते हैं कि चिकित्सकों को जेनेरिक दवा ही लिखने के निर्देश दिए गए हैं। जो दवाएं अस्पताल में उपलब्ध नहीं हैं, वह कम दाम पर जन औषधि केंद्र पर मिल जाएगी, लेकिन यहां भी स्थित उलट है। अभी भी अधिकांश चिकित्सक ब्रांडेड दवा लिख रहे हैं। लोग स्वयं जागरूक होकर जन औषधि केंद्र पर आ रहे है, पर वह दवा लेकर चिकित्सक को दिखाने जाते हैं, तो चिकित्सक दवा वापस करा देते है।

शुक्रवार को टैगोर विला स्थित जन औषधि केंद्र सूना पड़ा मिला। फार्मेसिस्ट ने बताया कि केंद्र पर 500 से अधिक दवाएं हैं। मुश्किल है कि चिकित्सक जेनेरिक दवा लिखते ही नहीं। नाममात्र के ही चिकित्सक ऐसा कर रहे हैं। बीते कुछ सालों में लोग कुछ जागरूक हुए हैं। वह अब खुद ही जेनेरिक दवा की मांग कर रहे हैं। पर इनकी संख्या अब भी बेहद सीमित है। मरीजों को मजबूरन ब्रांडेड दवा खरीदनी पड़ती है। जो उन्हें अत्याधिक महंगी पड़ती है।

शहर के प्रमुख सरकारी चिकित्सालय दून मेडिकल कालेज अस्पताल में जन औषधि केंद्र को लेकर कामचलाऊ व्यवस्था की गई है। यहां ओपीडी पंजीकरण काउंटर के पास इसके लिए बहुत थोड़ी जगह दी गई है। जहां अस्थायी काउंटर लगाया गया है। यहां मरीजों की भीड़ तुलनात्मक रूप से कुछ ज्यादा दिखी। पर वहां ड्यूटी कर रही कर्मचारी ने बताया कि अधिकतर चिकित्सक जेनेरिक दवाएं नहीं लिखते हैं। यदि कोई मरीज दवा खरीद लेता है और चिकित्सक को जाकर दिखाता है तो वे इसे वापस करवा देते हैं।

कैनाल रोड स्थित जन औषधि केंद्र भी सूना मिला। फार्मेसिस्ट ने बताया कि जेनेरिक दवाएं भी ब्रांडेड दवा की ही तरह काम करती हैं, लेकिन चिकित्सक जेनेरिक दवाई लिखते ही नहीं। बताया कि जन औषधि केंद्र पर तकरीबन हर बीमारी की दवा उपलब्ध है। ब्रांडेड के मुकाबले इसके दाम भी बहुत कम हैं। जरूरत इस बात की है कि चिकित्सक ज्यादा से ज्यादा जेनेरिक दवा लिखें। लोग कुछ जागरूक हुए हैं, पर इनकी संख्या कम है।

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