भारतीय अर्थव्यवस्था की निर्भरता ग्लोबल इकोनॉमी पर कम, जानें वजह..  

भारतीय अर्थव्यवस्था की निर्भरता ग्लोबल इकोनॉमी पर कम है। वहीं घरेलू मांग बेहतर होने के चलते पूरी दुनिया में खास तौर पर यूरोप और अमेरिका में छा रही मंदी का असर भारत पर कम पड़ने की संभावना है।

 भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से घरेलू मांग पर आधारित है। ग्लोबल इकोनॉमी पर निर्भरता कम होने के चलते यूरोप और अमेरिका में संभावित मंदी का असर भी कम पड़ने की संभावना है। दूसरी ओर देखें तो घरेलू बाजार में गाड़ियों की बिक्री के आंकड़े काफी आकर्षक हैं। दूसरे कॉर्पोरेट सेक्टर भी अच्छा कर रहे हैं। इसका संकेत जीएसटी कलेक्शन लगातार ऊंचा रहने से भी मिलता है। ये सभी तथ्य बता रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था अन्य देशों से बेहतर स्थिति में है।

भारतीय इकोनॉमी की मजबूती इन आंकड़ों से पता चलती है। सितंबर में 3.55 लाख यात्री वाहनों की बिक्री हुई, जो अब तक का रिकॉर्ड है। मांग की स्थिति यह है कि कई मॉडल पर वेटिंग एक साल तक पहुंच गई है। भारतीय कंपनियों का रेवेन्यू जून तिमाही में 35 प्रतिशत बढ़ा है, हालांकि इनपुट कॉस्ट बढ़ने के कारण मार्जिन कम हुआ है। उससे पहले मार्च तिमाही में भी रेवेन्यू में 20 प्रतिशत वृद्धि हुई थी। सितंबर तिमाही के नतीजे अब आने वाले हैं, इसमें भी रेवेन्यू में खासी वृद्धि की उम्मीद की जा रही है। जहां तक GST कलेक्शन की बात है, तो सरकार की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक 2022-23 में यह हर महीने 1.4 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा है। सितंबर में 1.47 लाख करोड़ रुपये का जीएसटी कलेक्शन हुआ है। पिछले साल सितंबर में सिर्फ 1.17 लाख करोड़ जमा हुए थे।

भारत की स्थिति का अंदाजा वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्ट के विश्लेषण से भी मिलता है। आईएमएफ ने हाल ही जारी ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक’ में आठ देशों की GDP विकास दर को भारत से अधिक बताया है। लेकिन वे सब छोटी इकोनॉमी हैं। रोचक बात यह है कि आठों देशों की जीडीपी का जो कुल आकार है, उसकी तुलना में भारत की जीडीपी डेढ़ गुना बड़ी है। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी इकोनॉमी है और इसका सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2.62 लाख करोड़ डॉलर है। दूसरी ओर, भारत से तेज ग्रोथ रेट वाले आठ देशों की जीडीपी का योग 1.74 लाख करोड़ डॉलर है।

रिपोर्ट के अनुसार गुयाना की ग्रोथ रेट सबसे अधिक 57.8% है, लेकिन वहां की 547 करोड़ डॉलर की इकोनॉमी भारत की जीडीपी का सिर्फ 0.2% है। टॉप-10 में भारत के बाद सबसे बड़ी इकोनॉमी सऊदी अरब की 42,114 करोड़ डॉलर की है, लेकिन वह भी भारत के मुकाबले सिर्फ 16% है। बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक विकास दर भारत (6.8%) की ही है।

क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी.के. जोशी कहते हैं, पूरी दुनिया में मंदी के हालात बन रहे हैं। ऐसे में भारत सबसे तेज बढ़ने वाली बड़ी इकोनॉमी के तौर पर उभर रहा है। भारत में गाड़ियों की बिक्री के आंकड़े काफी आकर्षक हैं। कॉर्पोरेट सेक्टर अच्छा कर रहा है। सरकार का जीएसटी कलेक्शन अच्छा है। ये सभी संकेत बता रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था अन्य देशों से बेहतर स्थिति में है। आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दुनिया की मंदी का असर होगा। देखना होगा कि ये असर कितना होता है।

विश्व बैंक ने खराब वैश्विक परिस्थितियों का हवाला देते हुए करीब एक हफ्ते पहले वित्त वर्ष 2022-23 के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर के अनुमान में कटौती करते हुए 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर का अनुमान लगाया है। यह जून 2022 के अनुमान से एक प्रतिशत कम है। विश्व बैंक के दक्षिण एशिया के मुख्य अर्थशास्त्री हैंस टिमर ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने दक्षिण एशिया के अन्य देशों की तुलना में अच्छा प्रदर्शन किया है। उन्होंने कहा कि भारत के पास बाहरी ऋण का अधिक बोझ नहीं है, इस मोर्चे पर कोई समस्या नहीं है और भारत की मौद्रिक नीति भी विवेकपूर्ण है।

आईएमएफ चीफ क्रिस्टलिना जॉर्जीवा ने भी कहा है कि भारत इस कठिन समय में भी तेजी से प्रगति कर रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत का विकास संरचनात्मक सुधारों पर आधारित है। भारत अब जी 20 का नेतृत्व करने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। हम भारत को आने वाले वर्षों में दुनिया पर छाप छोड़ते हुए देखेंगे। इस बात में दो राय नहीं कि बीते कुछ सालों में भारत की तरक्की दुनिया भर के देशों के लिए मिसाल है।

इसका कारण बताते हुए बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था घरेलू मांग पर आधारित है। ग्लोबल इकोनॉमी पर हमारी निर्भरता कम है। इसलिए ग्लोबल स्लोडाउन का हमारे ऊपर कम असर पड़ता है। एक्सपोर्ट जरूर प्रभावित हो सकता है। सबनवीस के अनुसार सरकारी और निजी क्षेत्र की ओर से खर्च के चलते अगले साल हमारी ग्रोथ रेट 6% से 6.5% के बीच बनी रहेगी, जो अन्य तमाम बड़े देशों से बेहतर है। यही कारण है कि आईएमएफ भारत को ब्राइट स्पॉट कह रहा है।

भारत की मजबूती के कारण

एसबीआई रिसर्च के अनुसार अमेरिका और यूरोप चार दशक की सबसे ऊंची महंगाई दर से जूझ रहे हैं। कंस्ट्रक्शन सेक्टर में गिरावट के कारण चीन के बैंकों की स्थिति कमजोर हुई है। महंगाई का स्तर भारत में भी ऊंचा है, लेकिन पश्चिमी देशों जितना नहीं। यहां के बैंक भी मजबूत स्थिति में हैं। भारत की आबादी जल्दी ही चीन से अधिक हो जाने की संभावना है। इसलिए यहां घरेलू डिमांड बढ़ने की पूरी संभावना है।

निर्यातकों के संगठन फियो (FIEO) के महानिदेशक और सीईओ डॉ. अजय सहाय के अनुसार ताइवान की वजह से दुनिया में चीन विरोधी सेंटिमेंट काफी मुखर है। कंपनियां या तो चीन से अपना निवेश निकाल रही हैं या वहां नया निवेश नहीं करना चाहती हैं।

हाल में सरकार ने कई सेक्टर के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम की घोषणा की है, उससे आने वाले वर्षों में भारत ऑटोमोबाइल कंपोनेंट, मेडिकल डिवाइस, सेमीकंडक्टर, टेलीकॉम उपकरण, सोलर मॉड्यूल और इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी के मामले में चीन को टक्कर दे सकता है।

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