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LOCKDOWN कोरोना वायरस

लाकडाउन में भारतीय अर्थव्यवस्था में आयी भारी गिरावट

भारत में 2020 कोरोना वायरस महामारी का आर्थिक प्रभाव काफी हद तक विघटनकारी रहा है मध्यम वर्गीय लोगो के लिये बहुत ही हानिकारक सबित हुआ। भारत सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार वित्तीय वर्ष 2020 की चौथी तिमाही में भारत की वृद्धि दर घटकर 3.1% रह गई है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि भारतीय अर्थव्यवस्था -4.5 की दर से सिकुड़ जायेगी, इस बात का अनुमान नहीं था कि लॉकडाउन के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था इतने नीचे पायदान पर आ जायेगी।

विश्व बैंक और रेटिंग एजेंसियों ने शुरू में वित्त वर्ष 2021 के लिए भारत के विकास का पूर्वानुमान किया जो कि भारत के 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद के तीन दशकों में सबसे कम आंकड़ों के साथ देखा गया अनुमान था। रिपोर्ट में वर्णित है कि यह महामारी ऐसे वक्त में भारत आई है जबकि वित्तीय क्षेत्र पर दबाव के कारण पहले से ही भारतीय अर्थव्यवस्था सुस्ती की मार झेल रही थी। कोरोना वायरस के कारण इस पर और दवाब बढ़ा गया है। जिससे सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था डामा-डोल हो गयी, हालाँकि मई के मध्य में भारत आर्थिक पैकेज की घोषणा के बाद भारत के सकल घरेलू उत्पाद के अनुमानों को नकारात्मक आंकड़ों से और भी अधिक घटा दिया गया था। यह एक गहरी मंदी का प्रतीक था। 26 मई को, क्रिसिल ने घोषणा की कि यह स्वतंत्रता के बाद से भारत की सबसे खराब मंदी होगी।

भारत सरकार ने केरल में 30 जनवरी 2020 को कोरोना वायरस के पहले मामले की पुष्टि की जब वुहान के एक विश्वविद्यालय में पढ़ रहा छात्र भारत लौटा था। 22 मार्च तक भारत में कोविड-19 के पॉजिटिव मामलों की संख्या 500 तक थी, इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 19 मार्च को सभी नागरिकों को 22 मार्च रविवार को सुबह 7 से 9 बजे तक 'जनता कर्फ्यू' करने को कहा था।

लॉकडाउन

24 मार्च को नरेन्द्र मोदी द्वारा 21 दिनों की अवधि के लिए उस दिन की मध्यरात्रि से देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा हुई। उन्होंने यह भी कहा कि लॉकडाउन जनता कर्फ्यू की तुलना में सख्ती से लागू किया जाएगा।

लॉकडाउन की घोषणा होते ही बडे-बडे कारखानों एवं कम्पनियों ताले लग गये और मजदूर अपने घर जाने के लिये सडको पर आ गये उनके घर तक जाने वाले सभी साधन बन्द हो गये थे एसे मे उनके सामने बहुत बडी चुनौती थी कि वह अपने परिवार के पास अपने गाँव घर कैसे पहुचे। एसे मे मजदूर सडको पर पैदल चलने लगे और अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर वह मजबूरन रोड पर भूखे प्यासे निकल पडें मानो देश में बहुत बडा अकाल पडा हो। कर्इ गर्भवती महिलाओं ने रास्तो पर ही अपने बच्चें को जन्म देने हेतु मजबूर थी। कर्इ गरीब बिना कुछ खाये पिये पैदल सडको पर चल रहें थे।

कोरोना वायरस के कारण पूरे देश में लॉकडाउन होने के कारण कई सरकारी व्यवसाय और उद्योग प्रभावित हुए हैं। घरेलू आपूर्ति और मांग प्रभावित होने के चलते आर्थिक वृद्धि दर बहुत ज्यादा प्रभावित हुई है। वहीं जोखिम बढ़ने से घरेलू निवेश में सुधार में भी देरी होने की संभावना दिख रही है। विश्व बैंक के अनुसार इस महामारी की वजह से भारत ही नहीं बल्कि समूचा दक्षिण एशिया गरीबी उन्मूलन से मिलें फायदे को गँवा सकता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ ने कहा है कि कोरोना वायरस सिर्फ़ एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट नहीं रहा, बल्कि ये एक बड़ा लेबर मार्केट और आर्थिक संकट भी बन गया है जो लोगों को बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगा। लॉकडाउन का सबसे ज़्यादा असर गैर-संगठित क्षेत्र पर पड़ा है और हमारी अर्थव्यवस्था का 50 प्रतिशत जीडीपी गैर-संगठित क्षेत्र से ही आता है, ऐसे में यह क्षेत्र लॉकडाउन के दौरान काम नहीं कर पा रहे, वो कच्चा माल नहीं ख़रीद पा रहे और बनाया हुआ माल बाज़ार में नहीं बेच पा रहे जिससे उनकी कमाई बंद सी पड़ गई। कोरोना वायरस दुनिया में कहीं और की तुलना में भारत में तेजी से फैल रहा है, भारत में 65 हजार से अधिक मौतें हुई हैं। इस कारण भारत में मज़दूरों की कमी के कारण रोजगार को बड़ा नुकसान हुआ है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सार्वजनिक वित्त को लेकर खींचतान के बीच कोरोना वायरस मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है और मुद्रा-स्फीति बढ़ने का मतलब है कि सुधार जल्दी नहीं हो सकता है। कुछ का कहना है कि अर्थव्यवस्था में मार्च 2021 के माध्यम से वर्ष में लगभग 10 प्रतिशत का संकुचन देखा जा सकता है। लाँकडाउन के शुरू के दिनो में वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने देश में 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को साकार करने के लिए घरेलू उद्योग को अधिक आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया था। परन्तु यह भी सफल नहीं हो पाया।

लॉकडाउन के दौरान अनुमानित 14 करोड़ लोगों ने रोजगार खो दिया जबकि कई अन्य लोगों के लिए वेतन में कटौती की गई थी। देश भर में 45% से अधिक परिवारों ने पिछले वर्ष की तुलना में आय में गिरावट दर्ज की है। पहले 21 दिनों के पूर्ण लॉकडाउन के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था को हर दिन 32,000 करोड़ से अधिक की हानि होने की आशंका थी। पूर्ण लॉकडाउन के तहत भारत के $2.8 ट्रिलियन आर्थिक संरचना का एक चौथाई से भी कम गतिविधि कार्यात्मक थी। अनौपचारिक क्षेत्रों में कर्मचारी और दिहाड़ी मजदूर सबसे अधिक जोखिम वाले लोग हैं। देश भर में बड़ी संख्या में किसान जो विनाशशील फल-सब्जी उगाते हैं, उन्हें भी अनिश्चितता का सामना करना पड़ा। महामारी से ठीक पहले, सरकार ने कम विकास दर और कम मांग के बावजूद 2024 तक अर्थव्यवस्था को अनुमानित $2.8 ट्रिलियन से $5 ट्रिलियन तक बदलने का लक्ष्य रखा था।

कोरोना वायरस ने देश महामारी तो फैली ही साथ ही बहुत लोगो ने अपना रोजगार खो दिया तथा बहुत परिवार आर्थिक तंगी से गुजरने लगे एवं उनके जीवन यापन में काफी समस्यों उत्पन्न होने लगी। लाकडाउन के बाद से आज भी यह लोग आर्थिक तंगी से गुजरने को मजबूर है। इसका असर आज देखने को मिल रहा है तथा अभी भविष्य मे भी बना रहेगा। देश के किसानो की हालत तो काफी खराब होती जा रही को सरकार नियम तो कही उनकी फसलों का सही समय पर उचित दाम न मिलना।


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