पवित्र गंगा बनी विषगंगा ,गंगा और उसकी सहायक नदियों में 37 वर्षों बाद भी नहीं रुकी सीवेज़ की निकासी

गंगा को स्वच्छ करने के लिए 1985 से चल रही कवायद अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची है। गंगा में अब भी 60 प्रतिशत सिवेज बिना उपचार बहाया जा रहा है। ” केंद्र सरकार ने गंगा को निर्मल और प्रभावपूर्ण बनाने के लिए 7 अक्टूबर, 2016 को गंगा नदी ( संरक्षण सुरक्षा एवं प्रबंधन )प्राधिकरण को आदेश जारी किया था। इस आदेश को अब छह साल बीत चुके हैं और नदी के पानी की गुणवत्ता व प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई दोनों बिल्कुल उत्साहित करने वाली नहीं है ।

भविष्य में गंगा की अपूर्णीय क्षति को किस तरह से रोका जाए ,इसके लिए इसके लिए भी कोई समय सीमा तय नहीं है । हर एक अंतराल पर गंगा में हो रहे प्रदूषण में बड़ी गिरावट होनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। ” यह सख्त टिप्पणी गंगा मामले पर सुनवाई कर रही देश की सर्वोच्च पर्यावरण अदालत नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी ) ने 22 जुलाई, 2022 को राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ( एनएमसीजी ) की गंगा पर एक स्थिति रिपोर्ट को गौर करने के बाद की है। एनएमसीजी की इस ताजा रिपोर्ट के मुताबिक ,प्रमुख गंगा राज्यों के जरिए नदी में बिना उपचार 60 फ़ीसदी घरेलू सीवेज और कुल 843 ग्रॉस पोल्यूटिंग इंडस्ट्रीज (जीपीआई) में नियम और मानकों का पालन ना करने वाली 141 इकाइयों का 15 फ़ीसदी औद्योगिक अपशिष्ट सीधा गंगा में गिराया जा रहा है। भले ही 2016 में गंगा नदी के संरक्षण को लेकर आदेश जारी किए हों लेकिन सफाई की रस्सा-कशी 37 वर्षों से जारी है । इतने वर्षों बाद भी गंगा की काया में कोई ठोस बदलाव नहीं हुआ है । 15 जुलाई, 2022 को ट्रिब्यूनल में दाखिल की गई एनएमसीजी की तिमाही गंगा स्थिति रिपोर्ट राष्ट्रीय नदी की स्वच्छता के कथित दावों और प्रयासों के कई और स्याह पक्ष उजागर करती है। इस रिपोर्ट के विश्लेषण में डाउन टू अर्थ ने पाया कि प्रमुख पांच गंगा राज्यों – बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में कुल 10,139.3 मिलियन लीटर प्रतिदिन ( एमएलडी ) सीवेज पैदा होता है और महज 3,959.16 एमएलडी ( 40 फ़ीसदी ) सीवेज का ही सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के जरिए उपचार हो रहा है। बाकी 6,180.2 एमएलडी ( 60 फ़ीसदी ) को सीधे गंगा में गिराया जा रहा है । गंगा का पर्यावरणीय प्रभाव भले ही मंद हो रहा है लेकिन परियोजनाओं के लिए फंड का प्रवाह जारी रहा है इन खर्चों पर स्पष्टता का संदेह बना रहा है। एनजीटी ने अपने फैसले पर इसकी isspastata पर भी सवाल उठाए और उन्हें भी इन खर्चों की सही जानकारी नहीं मिल पाई । 14 फरवरी, 2017 को गंगा सफाई मामले में ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ( एनजीटी ) के तत्कालीन अध्यक्ष जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने उत्तर प्रदेश जल निगम के अधिकारियों पर हापुड़ जिले में गढ़ स्थित एसटीपी के डिजाइन और कंस्ट्रक्शन में खराबी को लेकर सीबीआई जांच का आदेश दिया था । हालांकि ,इसकी रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं है। इसके बाद 13 जुलाई 2017 को एनजीटी ने अपने फैसले में कहा , ”गंगा इस वक्त देश की सर्वाधिक प्रदूषित नदी है । कई वर्षों के बाद सरकार ने कई घरेलू और औद्योगिक सीवेज उपचार के लिए परियोजनाओं को गंगा एक्शन प्लान के तहत शुरू किया। हालांकि , यह गौर करने लायक है कि एक बड़ी राशि एसटीपी ( सीवर ट्रीटमेंट प्लांट ) और इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट ( ईटीपी ) पर खर्च होने के बाद भी नदी प्रदूषित है ।

90 फ़ीसदी सीवेज गंगा में

एनएमसीजी रिपोर्ट का विश्लेषण बताता है कि गंगा में सर्वाधिक बिना उपचार शिविर गिराने वाला राज्य बिहार है। बिहार में कुल 1,002 एमएलडी सीवेज में 1,010 एमएलडी बिना उपचार सीधा गंगा में गिराया जा रहा है । इसी तरह झारखंड में 452 एमएलडी में 379 एमएलडी, उत्तराखंड में कुल 330 एमएलडी में 95 एमएलडी, उत्तर प्रदेश में 5,500 एमएलडी में 2,465 एमएलडी, पश्चिम बंगाल में 2,758 एमएलडी में 1,522 एमएलडी बिना उपचार ही गंगा में गिराया जा रहा है ( देखें: मैली गंगा )। इसी तरह औद्योगिक प्रवाह को थामना भी गंगा में एक बड़ी चुनौती बना हुआ है कुल 8 कॉमन इंफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) में 6 सीईटीपी मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं । इनमें ज्यादातर सीईटीपी उत्तर प्रदेश के कानपुर में है ।

राष्ट्रीय गंगा परिषद की पहली बैठक 14 दिसंबर 2019 में यूपी के कानपुर में हुई थी, इसकी अध्यक्षता पीएम मोदी ने की थी। इसके बाद से ऐसी कोई बैठक नहीं हुई । गंगा की स्वच्छता से जुड़ी परियोजनाओं के बजट और क्रियान्वयन को लेकर कार्यकारी समिति की अब तक 43 बैठकें हुई हैं। इनकी समीक्षा पीएम की समिति को करनी थी , ताकि बजट का क्रियान्वयन पारदर्शी बने। हालांकि ऐसा नहीं किया गया । शायद इसीलिए उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट को नमामि गंगे के तहत खर्च किए गए बजट का विवरण सरकार की ओर से नहीं दिया जा सकता है एनजीटी ने कहा कि सीपीसीबी की रिपोर्ट पर गौर करें तो गंगा डाउनस्ट्रीम में नारोरा के बाद 97 स्थानों पर पानी की गुणवत्ता ठीक नहीं है ,जिसकी वजह से गंगा का पानी आचमन और नहाने लायक तक नहीं है । एनजीटी के तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा ,”गंगा को पर्यावरणीय प्रवाह की जरूरत है न कि नदी में मल प्रवाह की। ”

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