“सुशांत सिंह राजपूत बच सकता था”

“सुपरस्टार सुशांत सिंह राजपूत बच सकता था। सुशांत सिंह राजपूत अब भी बॉलीवुड पर राज कर रहा होता। सुशांत की कला पर रिया की साज़िश का काला जादू कभी भारी नहीं पड़ता…अगर, वो वाकई कूर्ग चला गया होता, सुशांत के पिता ने अपनी शिक़ायत में लिखा है, उनका बेटा कूर्ग जाना चाहता था…लेकिन सवाल ये है कि कूर्ग जाकर सुशांत बचता कैसे…ऐसा मैं क्यों और किस आधार पर कह रहा हूं इसके पीछे बड़ा गंभीर तर्क है, और इस तर्क के लिए मैं आपको सुपरस्टार आमिर ख़ान के अतीत में ले जाना चाहूंगा, उनकी कुछ चुनिंदा फिल्मों से रूबरू कराऊंगा।

क़यामत से क़यामत तक, जो जीता वही सिकंदर, अकेले हम अकेले तुम…अगर आप फिल्मी पसंद इंसान हैं तो जानते होंगे कयामत से कयामत तक आमिर खान की पहली फिल्म थी, जो जीता वही सिकंदर भी आमिर की फिल्म थी, अकेले हम अकेले तुम ये भी आमिर की फिल्म थी। आपको लगता होगा इन तीनों ही फिल्मों के सुपरहिट होने के पीछे आमिर ख़ान का हाथ रहा, म्यूज़िक ने बड़ा रोल निभाया है तो यकीनन आप आधे ग़लत हैं क्योंकि ये फिल्में जिस विज़नरी इंसान ने बनायी उसका नाम है मंसूर खान। आमिर ख़ान के चचेरे भाई मंसूर ख़ान ने इन तीन सुपर हिट फिल्मों के बाद एक और फिल्म बनाई जिसका नाम था जोश, शाहरुख़ खान और ऐश्वर्या राय को लेकर..जोश भी सेमी हिट रही…लेकिन जोश के बाद मंसूर ख़ान अचानक गायब हो गए…ये बात उस समय उस वक्त मायानगरी मुंबई में बहुत से लोगों को पता नहीं चली, लोग बॉलीवुड की पार्टियों में खुसर-फुसर करते थे मंसूर कहां गया, मंसूर कहां गया..लेकिन किसी को पता नहीं चला मंसूर कहां गया।

आपको यकीन नहीं होगा मंसूर ख़ान करीब बीस साल से इसी कूर्ग से ढाई सौ किलोमीटर दूर कुन्नूर में ऑर्गेनिक फार्मिंग करते हैं। आमिर को भी मंसूर के इस कदम का पता तब चला जब एक दिन खुद आमिर को मंसूर ने फोन करके बताया कि वो कुन्नूर में हैं और जैविक खेती शुरू कर चुके हैं.. मंसूर ने अपनी चार फिल्मों से जितना कमाया उससे तमिलनाडु के कुन्नूर में सात-आठ एकड़ ज़मीन, सात देसी गाय, दो बकरियां खरीद लीं.. ये सब मंसूर ख़ान ने क्यों किया पता है सिर्फ और सिर्फ मन की शांति के लिए।

मैं सुशांत के बचने की बात इसीलिए बोल रहा हूं क्योंकि जिस वक्त मंसूर ख़ान ने ऑर्गेनिक फार्मिंग का फैसला किया उस वक्त वो भी ज़िंदगी के दोराहे पर खड़े थे, बेहद ज्यादा डिप्रेस्ड थे, उनके माता-पिता की कुछ समय के अंतराल में एक साथ मृत्यु हो गई थी, जिसने इस टैलेंटेड इंसान, नेशनल अवॉर्डी डायरेक्टर को तोड़ के रख दिया..इसके बावजूद मंसूर ने हार नहीं मानी और अपने बचपन के ख्वाब यानी खेती के लिए मुंबई से दूर कुन्नूर में ज़मीन खरीद ली.. मंसूर उनकी पत्नी टीना, और दोनों बच्चे भी वहीं रहते हैं ऑर्गेनिक फार्मिंग के साथ-साथ चीज़ बनाने का बिज़नेस करते हैं.. खुद मंसूर बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटी और सेमिनार में जाकर खेती और उनसे जुड़े विषयों पर लेक्चर देते हैं..प्रकृति को लेकर उन्होंने एक बेहद पॉपुलर बुक The third curve लिखी है, समय मिले तो पढ़िएगा।

हालांकि कभी-कभी सिनेमा का कीड़ा काटता है तो मंसूर खान इस भूख को मिटाने मुंबई लौटते हैं। 2008 में भांजे इमरान ख़ान को लॉन्च करने वाली फिल्म जाने तू या जाने ना के प्रोड्यूसर मंसूर ही थे। ऐसा नहीं कि मंसूर खान सुशांत से कम पढ़े लिखे हैं..मंसूर ने IIT बॉम्बे, MIT (मैशाचुएट्स) जैसे संस्थानों से पढ़ाई की है। लेकिन जब तनाव हावी हो गया तो पढ़ाई, पैशन सबको छोड़कर मिट्टी को आत्मसात करने चले गए।

सुशांत भी कर्नाटक के कूर्ग में यही सबकुछ करना चाहता था, ज़मीन से जुड़ना चाहता था..वादियों और झरनों की कल-कल के बीच शांति तलाशना चाहता था…पर उसमें एक कमी रह गई, वो एक स्ट्रांग कदम नहीं उठा पाया.. बेवफा महबूब की साज़िश को नहीं पहचान पाया..अगर मिट्टी के नज़दीक एक बार चला जाता तो यकीनन हर डिप्रेशन से ऊपर उठ जाता, मायानगरी में ना सही इस दुनिया में तो होता..जानता हूं ये सब बातें किसी की मौत के बाद लिखना आसान है, किंतु ये भी अटल सत्य है जो जीता वही सिकंदर, और सुशांत इस रेस में हार गया”।

पत्रकार रोहित बिष्ट की कलम से…लेखक टीवी पत्रकार हैं और गौतमबुद्धनगर में रहते हैं…यह लेखक के निजी विचार हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

four + eighteen =

Back to top button