देश के मौजूदा हालात पर लिखी गई पत्रकार रोहित बिष्ट की ये कविता आपको जरूर पढ़नी चाहिए!

उत्तर प्रदेश के हाथरस में युवती के साथ अमानवीय कृत्य को पूरे देश ने देखा। पीड़िता की दुखद मौत हो गई। हाथरस का ये मामला इस तरह का पहला अमानवीय मामला नहीं है जिसको लेकर देश गुस्से में है। दिल्ली में हुई निर्भया घटना के बाद मीडिया और देश की जनता ने बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। तब से तमाम कड़े नियम बनाए गए। मृत्युदंड तक का प्रावधान लाया गया बावजूद इसके महिलाओं के प्रति वारदात थमने का नाम नहीं ले रही। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्यों अपराधियों के मन में पुलिस कानून का खौफ नहीं है?

देश की राजनीति में धोतीखोल स्पर्धा चल रही है। यह राजनीति है। सत्ता का खेल। सत्ता के इस खेल में जनता से जुड़े मुद्दे ‘बोने’ हो रहे हैं। आजादी से लेकर अब तक यही खेल चल रहा है। लिहाजा हमारा समाज और समाज की सोच उस स्तर तक नहीं पहुंच पाई है जहां के लिए वांछित थी। 

आज हमारा समाज, जिस तेजी से टूट और बिखर रहा है उस पर सोचना लाजमी है कि हम क्या थे, क्या हुए और इसी रास्ते पर चलते रहे, तो क्या होंगे? आखिर हमारा समाज जा कहां रहा है? 

इस गिरते सामाजिक सरोकार पर पत्रकार रोहित बिष्ट ने एक सटीक कविता लिखी है जो वर्तमान में देश के हालात पर सटीक टिप्पणी है। रौद्र रस में लिखी गई ये कविता सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। 


“मुर्दा हैं, सब मुर्दा हैं
गांव है मुर्दा, कस्बा मुर्दा
साहब का ये शहर भी मुर्दा
खामोशी में जीते जाओ
सरगोशी में वक्त बिताओ
अंतर्मन के आंदोलन को
जाओ-जाओ खूब दबाओ
मुर्दा हैं, सब मुर्दा हैं.. 

भयभीत-व्यथित समाज है मुर्दा
भ्रमित-कुंठित अल्फाज़ हैं मुर्दा
खंड-खंड में उलझे जाओ
अंड-बंड में लड़ते जाओ
चक्रव्यूह अब ना टूटेगा
अभिमन्यु भी ना लौटेगा
मुर्दा हैं, सब मुर्दा हैं..

पढ़े-लिखे का ज्ञान है मुर्दा
अनपढ़ का अज्ञान है मुर्दा
नरमुंडों की बस्ती है
गुंडों की अब हस्ती है
गांधी, सुभाष की ताक़त भूले
आज़ाद, पटेल, भगत को भूले
मुर्दा हैं सब मुर्दा हैं…   

धर्म के ठेकेदार हैं मुर्दा
फर्ज़ के पहरेदार हैं मुर्दा
जाओ, जाओ मुंह छिपाओ
खुल्लम खुल्ला खून बहाओ
बेटी की आवाज़ दबाओ
लम्पट लाल को खूब चढ़ाओ
मुर्दा हैं सब मुर्दा हैं… 

झूठी ये सरकार है मुर्दा
विपक्ष की तकरार है मुर्दा
रोज़ चुनाव का भोंपू बजाओ
वोटर को हर दिन उलझाओ
पांच साल फिर खूब भगाओ
जनता का उल्लास उड़ाओ
मुर्दा हैं सब मुर्दा हैं..

जो ज़िंदा हैं वो जिद्दी हैं
वो सवाल तो पूछेंगे
अपने रुठे या रब रूठे
सत्य के साथ वो जीतेंगे
मुर्दों में भी ज़िंदा हैं… मुर्दों में भी ज़िंदा हैं”
 

कविता के रचयिता रोहित बिष्ट हैं एवं नोएडा में टीवी पत्रकार हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

sixteen − eight =

Back to top button